अच्छे पाठक चाहिए तो बच्चों के लिए अच्छा साहित्य लिखना होगा
कुछ वर्ष पहले प्रसिद्ध कवि, गीतकार और लेखक गुलजार चंडीगढ़ गए थे। वहां एक साहित्यिक कार्यक्रम में उन्होंने एक ऐसी बात कही थी, जो केवल साहित्यकारों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए विचारणीय है। उन्होंने कहा था कि पंजाबी और उर्दू में समृद्ध बाल साहित्य का अभाव है, जबकि बंगाली, मराठी और मलयालम जैसी भाषाओं में बच्चों के लिए उत्कृष्ट साहित्य की परंपरा मौजूद है।
गुलजार का यह कथन केवल एक भाषाई टिप्पणी नहीं था। यह उस गहरे संबंध की ओर संकेत था, जो किसी समाज की पाठकीय संस्कृति और उसके बाल साहित्य के बीच मौजूद होता है। जिस भाषा में बच्चों के लिए अच्छी किताबें लिखी जाती हैं, वहां बड़े होकर अच्छे पाठक भी तैयार होते हैं। और जहां अच्छे पाठक होते हैं, वहां अच्छा साहित्य भी जीवित रहता है।
0 बच्चों के लिए लिखना सबसे कठिन लेखन है
अक्सर यह भ्रम रहता है कि बच्चों के लिए लिखना आसान होता होगा। आखिर बच्चे तो सरल बातें समझते हैं। लेकिन सच्चाई इसके बिलकुल उलट है।
आठ वर्ष के बच्चे की भाषा, कल्पना और समझ बारह वर्ष के बच्चे से अलग होती है। पांच वर्ष का बच्चा जिस दुनिया में रहता है, पंद्रह वर्ष का किशोर उससे बहुत आगे निकल चुका होता है। इसलिए बच्चों के लिए लिखना केवल कहानी लिखना नहीं, बल्कि उनकी मानसिक दुनिया में प्रवेश करना है।
गुलजार ने एक बार कहा था कि अच्छा बाल साहित्य वह है, जिसे पढ़कर बच्चे भी आनंद लें और बड़े भी। यदि कोई कहानी माता-पिता को ही उबाऊ लगे, तो बच्चे उसे कितनी देर तक पढ़ेंगे? यही कसौटी श्रेष्ठ बाल साहित्य की पहचान है। वह उम्र की सीमाओं को पार कर जाता है।
0 अच्छे लेखक भी यहां अक्सर चूक जाते हैं
हिंदी और गुजराती सहित भारतीय भाषाओं में एक बड़ी समस्या यह है कि बच्चों के लिए लिखने को अक्सर साहित्य की मुख्यधारा से अलग मान लिया जाता है। बड़े लेखक उपन्यास, कविता, संस्मरण और आलोचना तो लिखते हैं, लेकिन बाल साहित्य को गंभीरता से नहीं लेते। परिणाम यह होता है कि बच्चों के लिए जो साहित्य उपलब्ध है, उसका बड़ा हिस्सा या तो उपदेशात्मक होता है या फिर पुराने आख्यानों का दोहराव।
निस्संदेह, लोककथाएं, रामायण और महाभारत की कथाएं हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। लेकिन क्या बच्चों की कल्पना केवल अतीत में ही विचरण करती है? क्या उन्हें आज के विज्ञान, प्रकृति, रोमांच, हास्य और बदलती दुनिया के बारे में पढ़ने का अधिकार नहीं है?
बाल साहित्य का संसार जितना व्यापक होगा, बच्चों की कल्पना भी उतनी ही विस्तृत होगी।
0 पढ़ने की आदत बचपन में ही जन्म लेती है
हम अक्सर शिकायत करते हैं कि नई पीढ़ी किताबें नहीं पढ़ती। लेकिन शायद हमें यह प्रश्न पहले पूछना चाहिए कि हमने उन्हें पढ़ने के लिए दिया क्या? कोई भी व्यक्ति अचानक तीस या चालीस वर्ष की उम्र में पुस्तक-प्रेमी नहीं बन जाता। पढ़ने की आदत बचपन में विकसित होती है। जब बच्चा पहली बार चित्रों वाली पुस्तक हाथ में लेता है, जब वह किसी कहानी के पात्र से दोस्ती करता है, जब वह किसी कल्पनालोक में खो जाता है, तभी उसके भीतर एक पाठक जन्म लेता है।
बाद में वही बच्चा उपन्यास पढ़ता है, कविता पढ़ता है, इतिहास और विज्ञान पढ़ता है। धीरे-धीरे वह स्वयं सोचने लगता है। किताबें केवल जानकारी नहीं देतीं, वे दृष्टि भी देती हैं।
0 हर उम्र के लिए अलग साहित्य की जरूरत
बाल साहित्य को अक्सर एक ही श्रेणी मान लिया जाता है, जबकि वास्तव में यह कई स्तरों में विभाजित है।
1- तीन से पांच वर्ष : चित्र और भाषा का पहला परिचय
इस आयु में बच्चे शब्दों से अधिक चित्रों को समझते हैं। रंग-बिरंगे चित्र, छोटे वाक्य और सरल कथाएं उनके लिए सबसे उपयुक्त होती हैं। यहां उद्देश्य मनोरंजन के साथ भाषा का परिचय कराना है।
2- छह से आठ वर्ष : स्वयं पढ़ने की शुरुआत
अब बच्चा अक्षरों को पहचानने लगता है। वह छोटी-छोटी कहानियां स्वयं पढ़ सकता है। इस आयु के लिए ऐसी पुस्तकें चाहिए जो उसे पढ़ने का आत्मविश्वास दें और पढ़ने को आनंद से जोड़ें।
3- नौ से ग्यारह वर्ष : कल्पना और जिज्ञासा का विस्तार
यह वह उम्र है जब बच्चे प्रश्न पूछना शुरू करते हैं। उन्हें रहस्य, रोमांच, विज्ञान, प्रकृति और हास्य आकर्षित करते हैं। वे दुनिया को समझना चाहते हैं, लेकिन अभी भी उनकी कल्पना निष्कलुष होती है।
4- बारह से चौदह वर्ष : किशोर मन की उड़ान
इस आयु में साहसिक कथाएं, खोजबीन, रहस्य और व्यक्तित्व-विकास से जुड़ी कहानियां प्रभाव डालती हैं। बच्चे अब केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पहचान और उद्देश्य भी खोजने लगते हैं।
5- पंद्रह से अठारह वर्ष : युवा साहित्य की आवश्यकता
पश्चिमी देशों में ‘यंग एडल्ट लिटरेचर’ एक विशाल साहित्यिक क्षेत्र है। वहां किशोरों की भावनाओं, संघर्षों, सपनों और सामाजिक प्रश्नों पर हजारों उपन्यास लिखे जाते हैं।
भारतीय भाषाओं में यह क्षेत्र अभी भी लगभग रिक्त है। किशोर सीधे बाल साहित्य से वयस्क साहित्य में छलांग लगाने को विवश हो जाते हैं। बीच का यह पुल अभी बनना बाकी है।
किताबें नहीं, संस्कृति बनानी होगी
किसी भाषा की समृद्धि केवल उसके शब्दकोश से नहीं मापी जाती। उसकी असली शक्ति उसके पाठकों से तय होती है।
जब किसी लोकप्रिय लेखक की नई पुस्तक प्रकाशित होते ही हजारों प्रतियाँ बिक जाती हैं, तो उसके पीछे दशकों से तैयार हुई पाठकीय संस्कृति होती है। यह संस्कृति विद्यालयों, परिवारों, पुस्तकालयों और बाल साहित्य से मिलकर बनती है।
यदि हम चाहते हैं कि हिंदी, गुजराती या किसी भी भारतीय भाषा में पढ़ने वालों की संख्या बढ़े, तो हमें बच्चों से शुरुआत करनी होगी। केवल साहित्य उत्सवों, पुरस्कारों और विमोचन समारोहों से पाठक पैदा नहीं होते। पाठक पैदा होते हैं कहानियों से, चित्र पुस्तकों से, रोमांचक उपन्यासों से और उन किताबों से जिनसे बच्चों को प्रेम हो जाए।
0 भविष्य का निवेश है बाल साहित्य
व्यापार की दुनिया में एक शब्द प्रचलित है, ‘बैकवर्ड इंटीग्रेशन’। अर्थात भविष्य की सफलता सुनिश्चित करने के लिए स्रोत को मजबूत करना। साहित्य की दुनिया में भी यही सिद्धांत लागू होता है। यदि आज हम बच्चों के लिए श्रेष्ठ साहित्य रचते हैं, तो कल हमें बेहतर पाठक मिलेंगे। बेहतर पाठक होंगे तो बेहतर लेखक भी पैदा होंगे। और बेहतर लेखक होंगे तो भाषा का भविष्य सुरक्षित रहेगा।
बाल साहित्य कोई छोटा साहित्य नहीं है। यह साहित्य की जड़ है। जड़ मजबूत होगी तो वृक्ष भी हरा-भरा रहेगा।
इसलिए आज आवश्यकता केवल यह पूछने की नहीं है कि बच्चे किताबें क्यों नहीं पढ़ते। आवश्यकता यह पूछने की है कि हमने उनके लिए ऐसी कितनी किताबें लिखी हैं, जिन्हें पढ़कर वे किताबों से प्रेम कर सकें।
क्योंकि हर महान पाठक की यात्रा किसी न किसी बाल कहानी से ही शुरू होती है।

वीरेंद्र बहादुर सिंह
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