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खगोल विज्ञान के अनुसार तिथि की क्षय और वृद्धि के बारे में शास्त्रीय समझ

सामान्यतः भारतीय समाज में प्रत्येक कार्य के लिए मुहूर्त देखा जाता है और वह ज्योतिषशास्त्र के अनुसार निर्धारित किया जाता है। उससे संबंधित जिस पुस्तक आदि का उपयोग किया जाता है, उसे पंचांग या पत्री कहा जाता है। पंचांग में उसके नाम के अनुसार पांच अंग होते हैं- (1) तिथि, (2) वार, (3) नक्षत्र, (4) करण और (5) योग। इनमें सबसे पहले तिथि आती है। यहां हम पूज्य आचार्य नंदिघोषसूरिश्वरजी महाराज के ‘जैन विश्वकोश’ में प्रकाशित लेख के माध्यम से तिथि का शास्त्रीय तथा वैज्ञानिक अर्थात् खगोल विज्ञान के अनुसार अर्थ समझने का प्रयास करेंगे।

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि तिथि किसे कहते हैं। तिथि अर्थात् सूर्य और चंद्रमा के बीच का कोणीय (अंशात्मक) अंतर। चंद्रमा एक दिन में एक नक्षत्र को पार करता है। अमावस्या की समाप्ति के समय सूर्य और चंद्रमा ज्योतिषशास्त्र के अनुसार एक ही राशि, अंश, कला और विकला पर होते हैं। अर्थात् सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक ही सीध में होते हैं तथा उस समय सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा स्थित होता है। चंद्रमा को उपग्रह इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वह पृथ्वी की परिक्रमा करता है। सूर्य की परिक्रमा करने वाले गोलाकार खगोलीय पिंड को ग्रह कहा जाता है, जबकि उस ग्रह की परिक्रमा करने वाले खगोलीय पिंड को उपग्रह कहा जाता है। इस परिभाषा के अनुसार हमारी पृथ्वी एक ग्रह है और उसकी परिक्रमा करने वाला चंद्रमा उसका उपग्रह है।

चंद्रमा स्वयं प्रकाशमान नहीं है। उस पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है, जो परावर्तित होकर पृथ्वी तक पहुंचाता है। यही प्रकाशित भाग हमें चंद्रमा की विभिन्न कलाओं के रूप में दिखाई देता है। अमावस्या के दिन चंद्रमा का प्रकाशित अर्धगोलाकार भाग पूरी तरह सूर्य की ओर होता है, जबकि पृथ्वी की ओर उसका अप्रकाशित भाग रहता है। इसलिए अमावस्या के दिन चंद्रमा दिखाई नहीं देता। इस परिक्रमा को पूरा करने में लगभग 29 दिन और 6 घंटे लगते हैं। पूरे 30 दिन नहीं लगते, इसलिए चंद्र मास में कभी-कभी केवल 29 दिन ही होते हैं।

तिथि अर्थात् सूर्य और चंद्रमा के बीच का अंतर। यह अंतर 13 अंश का माना जाता है। यद्यपि वास्तविक रूप से यह अंतर केवल 12 अंश का ही होता है, परंतु जब तक चंद्रमा 12 अंश आगे बढ़ता है, तब तक सूर्य भी एक दिन में लगभग 1 अंश आगे बढ़ जाता है। इसलिए 12 अंश का वास्तविक अंतर पूरा करने के लिए चंद्रमा को एक अंश और आगे बढ़ना पड़ता है। अर्थात् अगले मास की अमावस्या के दिन सूर्य के साथ पुनः एक ही सीध में आने के लिए चंद्रमा को 360 अंश नहीं, बल्कि 390 अंश की गति करनी पड़ती है।

एक तिथि के लिए आवश्यक 13 अंश का अंतर तय करने में सामान्यतः चंद्रमा को एक दिन का समय लगता है, किंतु चंद्रमा की गति हमेशा समान नहीं रहती। इसका कारण सूर्य तथा अन्य ग्रहों का गुरुत्वाकर्षण बल है। सामान्यतः जब कोई ग्रह या चंद्रमा सूर्य के निकट जाता है, तब सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के कारण उसकी गति बढ़ जाती है और जब वह सूर्य से दूर जाता है, तब उसकी गति धीमी हो जाती है।

इसी कारण जब चंद्रमा की गति अधिक होती है, तब उसे 13 अंश का अंतर तय करने में 24 घंटे से भी कम समय लगता है। इसलिए कभी-कभी एक तिथि केवल 22 घंटे की भी हो सकती है। इसी प्रकार जब चंद्रमा की गति धीमी होती है, तब उसे 13 अंश का अंतर पूरा करने में 24 घंटे से अधिक समय लगता है। इसलिए कभी-कभी एक तिथि 27 घंटे की भी हो सकती है।

सूर्य और चंद्रमा के बीच का यह 13 अंश का अंतर दिन या रात में किसी भी समय पूरा हो सकता है। जैसे ही यह अंतर पूरा होता है, उसी क्षण नई तिथि का प्रारंभ हो जाता है। तिथि के प्रारंभ या समाप्ति का पृथ्वी पर दिन-रात, सूर्योदय अथवा सूर्यास्त से कोई संबंध नहीं होता। यह पूर्णतः एक आकाशीय (खगोलीय) घटना है। इसका पृथ्वी के अक्षांश या देशांतर से भी कोई संबंध नहीं है। इसलिए तिथि का प्रारंभ और समाप्ति पूरे विश्व में एक ही समय पर होती है। इसी प्रकार नक्षत्र का प्रारंभ और समाप्ति भी पृथ्वी के दिन-रात या सूर्योदय-सूर्यास्त पर निर्भर नहीं होती, इसलिए वह भी संपूर्ण विश्व में एक साथ होती है।

हिंदू पंचांग के नियम के अनुसार, जिस दिन सूर्योदय के समय जो तिथि चल रही होती है, वही उस पूरे दिन की तिथि मानी जाती है। इसी कारण जब कोई तिथि छोटी या बड़ी हो जाती है, तब तिथि का क्षय अथवा वृद्धि होती है।

ज्योतिषशास्त्र के ग्रंथों के अनुसार यदि एक ही वार में तीन तिथियां पड़ती हों, अर्थात बीच की तिथि पूरी तरह भोगी जाती हो तथा उससे पहले और बाद की तिथियों का भी कुछ-कुछ भाग आता हो, तो उस मध्य की तिथि को क्षय तिथि कहा जाता है। दूसरी ओर यदि एक ही तिथि तीन वारों को स्पर्श करती हो, तो उसे वृद्धि तिथि कहा जाता है।

अब इसे एक उदाहरण द्वारा समझते हैं। वर्तमान विक्रम संवत् 2074 में तिथि-क्षय का उदाहरण देखें। जन्मभूमि पंचांग के अनुसार कार्तिक वद-1 (परीवा) 5 नवंबर को प्रातः 7 बजकर 41 मिनट पर समाप्त होती है। उस दिन मुंबई में सूर्योदय 6 बजकर 41 मिनट पर होता है। अर्थात् सूर्योदय के बाद लगभग एक घंटे तक कार्तिक वद-1 रहती है और 7 बजकर 41 मिनट पर वद-2 (दूज) प्रारंभ हो जाती है।

यह दूज तिथि चंद्रमा की अधिक गति के कारण अगले दिन अर्थात् 6 नवंबर को सूर्योदय से पहले प्रातः 4 बजकर 19 मिनट पर ही समाप्त हो जाती है और वद-3 (तीज) प्रारंभ हो जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि दूज तिथि एक भी सूर्योदय के समय विद्यमान नहीं रहती। इसलिए कार्तिक वद-2 का क्षय माना जाता है।

वार की गणना एक दिन के सूर्योदय से अगले दिन के सूर्योदय तक होती है। इसलिए यहां एक ही वार अर्थात् रविवार में परीवा, दूज और तीज, तीनों तिथियां आती हैं। इनमें से मध्य की बीज तिथि किसी भी दिन के सूर्योदय को स्पर्श नहीं करती, इसलिए ज्योतिषशास्त्र में उसका क्षय माना जाता है। ऐसी क्षय तिथि को मुहूर्त के लिए स्वीकार नहीं किया जाता।

जैन पंचांग में भी इसी प्रकार तिथि का क्षय और वृद्धि होती है, लेकिन बारह पर्व तिथियों अर्थात् शुक्ल पक्ष की द्वितीया, पंचमी, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा, तथा कृष्ण पक्ष की द्वितीया, पंचमी, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी और अमावस्या, इन कुल बारह पर्व तिथियों में यदि लौकिक पंचांग के अनुसार क्षय या वृद्धि होती है, तो आराधना के उद्देश्य से इन पर्व तिथियों का क्षय या वृद्धि उसी प्रकार स्वीकार नहीं किया जाता।

शास्त्रवचन के अनुसार ऐसे अवसर पर द्वितीया, पंचमी, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी और त्रयोदशी का क्षय माना जाता है। चतुर्दशी-पूर्णिमा तथा चतुर्दशी-अमावस्या युग्म पर्व तिथियां होने के कारण उनके क्षय में भी त्रयोदशी का ही क्षय माना जाता है।

इसी प्रकार यदि लौकिक पंचांग में दो द्वितीया, दो पंचमी, दो अष्टमी, दो एकादशी, दो चतुर्दशी, दो पूर्णिमा अथवा दो अमावस्या आती हैं, तो दूसरी तिथि को यथावत रखते हुए उससे पूर्व की तिथि की वृद्धि की जाती है। अर्थात् दो द्वितीया होने पर दो प्रतिपदा, दो अष्टमी होने पर दो सप्तमी, दो एकादशी होने पर दो दशमी, तथा दो चतुर्दशी, दो पूर्णिमा या दो अमावस्या होने पर दो त्रयोदशी मानी जाती हैं।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि ज्योतिषशास्त्र तथा सामान्य समाज में सूर्योदय के समय जो तिथि होती है, वही पूरे दिन की तिथि मानी जाती है। किंतु जैन समाज के कुछ गच्छों अथवा संप्रदायों में संध्या के समय प्रतिक्रमण की विधि करते समय अर्थात् सूर्यास्त के समय जो तिथि होती है, उसी को मानने की परंपरा भी है। इसलिए कभी-कभी एक परंपरा में चतुर्थी होती है और यदि वह चतुर्थी सूर्योदय के बाद तथा सूर्यास्त से पहले समाप्त हो जाए, तो दूसरे गच्छ अथवा परंपरा में उसी दिन पंचमी मानी जा सकती है। इस प्रकार तिथि की व्यवस्था चंद्रमा और सूर्य के बीच के कोणीय (अंशात्मक) अंतर के आधार पर निर्धारित होती है।

यहां दर्शाई गई चंद्रमा की कलाओं के अनुसार यदि सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के साथ 0 अंश का कोण बनाते हैं, तो अमावस्या की समाप्ति तथा शुक्ल प्रतिपदा (परीवा) का प्रारंभ माना जाता है। यदि चंद्रमा और सूर्य पृथ्वी के साथ 90 अंश का कोण बनाते हैं, तो शुक्ल अष्टमी होती है। यदि चंद्रमा और सूर्य पृथ्वी के साथ 180 अंश का कोण बनाते हैं, तो पूर्णिमा होती है। और यदि चंद्रमा, सूर्य तथा पृथ्वी के साथ 270 अंश का कोण बनाते हैं, तो कृष्ण अष्टमी होती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि तिथि का आधार पूर्णतः चंद्रमा और सूर्य की स्थिति पर निर्भर करता है।

अनिकेत सिंह 

लवकुश कोचिंग क्लास, 

शाॅप नंबर-12, प्रथम तल,

अभिषेक एलिसियम, एक्सिस बैंक लेन, समा-सालवी रोड, न्यू समा,

बड़ौदा-390008 (गुजरात)

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