नियति को नहीं बल्कि सरकार को युवाओं को रोजगार देना मंजूर नहीं
वैसे तो संविधान ने सभी को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार दे रखा है पर क्या आज युवा सम्मानजनक जीवन जी रहा हैं? एक यूवा का रोज़गार केवल उसका अधिकार ही नहीं ब्लकि उसकी सुरक्षा और सम्मान भी है लेकिन वह अब टूट रहा हैं असफल सिस्टम कि गाज उस पर ऐसे गिर रहीं हैं कि उसकी जान तक चली जा रहीं है वह इतना मजबूर और असहाय महसूस कर रहा है कि अपनी जान खुद ले लें रहा हैं। इन सबका जिम्मेदार कौन है? क्या ये युबा खुद हैं जो अपने आपको आठ बाड़ आठ के रूम में बंद करके पढ़ रहे हैं या उसके घरवाले जो अपने खून पसीनो को पैसों में तब्दील करके अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेज रहे हैं? क्या रामराज्य ऐसा होता है जिसमें सिस्टम युवा को इस तरह से निगल लेता है। इसी महीने में नीट पेपर लीक होने से कई बच्चों ने आत्महत्या कर ली और ऐसे में छात्रों को भारत के आला अधिकारियों द्वारा कॉकरोच कहा जाता है यह कितना शर्मनाक है कि आप अपने देश के युवा के भविष्य की चिंता करने के बजाय उन्हें ऐसे बेत्के शब्दों से नवाज रहे है। पेपर लीक के मामले को लेकर जंतर-मंतर पर CJP ‘वहीं कॉकरोच शब्द जिसे एक युवा ने युवा के फेवर में बदल कर कॉकरोच जनता पार्टी में तब्दील कर दिया और AISA जैसे छात्र संगठनों द्वारा प्रोटेस्ट चल रहा हैं तो दूसरी तरफ लखनऊ के अलीगंज के पुरनिया में एक प्राइवेट लाइब्रेरी में आग लगने से करीब 15 छात्रों की जान चली गई। एक तरफ युवा का गुस्सा इस बात की मांग कर रहा है कि शिक्षा मंत्री से अगर पद नहीं सम्भाला जा रहा हैं तो वह इस्तीफा दे, दूसरी तरफ इस झुलसा देने वाली गर्मी में एक लाइब्रेरी में आग लगने से छात्रों की मौत इस बात को पुख्ता कर रहीं हैं कि युवा बेरोजगारी का दंश अब जहर बनता जा रहा हैं।
एक छात्र अपने सुनहरे भविष्य के लिए क्या नहीं कर रहा है। कहा जाता है जबानी जीने का दौर होता है लेकिन बेरोजगारी का डर उसे एक कमरे में बंद कर दे रहा हैं। पेपर पास कर लेने के लिए कुछ किताबों को इतना पढ़ता है कि उसका पेज और लाइन उसे याद हो जाती है पेपर निकाल लेने के लिए और अपना मन पढ़ाई में लगे रहने के लिए एक छात्र ना जाने क्या-क्या करता है, अपना रुटीन बनाता है और अगर आप उसके रूटीन को देखेंगे तो उसमें वह अपने आपको पढ़ाई के लिए ऐसे बाँध देता है जहाँ से वह अपने आपको समाज से और समाज के सारे function से काट लेता है। उसके रुटीन में पढ़ने का समय ज्यादा पर सोने और अपने स्वास्थ्य पर ध्यान करने के लिए कम होता है। वह अपने मनोदशा को बनाए रखने के लिए ना जाने कौन-कौन सी मोटिवेशनल वीडियो देखता है। वह सोचता है कि दिन नौकरी मिल जाएगी तब वह सब सही कर लेगा।
पर वह नहीं जानता कि नियति को नहीं ब्लकि सरकार को कुछ और ही मंजूर हैं। एक छात्र
यह नहीं समझ पाता कि सरकारी नौकरियां सरकारों के नियत पर निर्भर करती हैं एक सीट पर अगर लाखों का कंपटीशन होगा तो वह किस तरह का कंपटीशन करेगा कि पास हो जाएगा? आज छात्र की सबसे बडी कमज़ोरी यह कि वह सरकारी नियत से अनभिज हैं क्योंकि सरकारें चाहती नहीं है कि उनके युवा को सम्मानजनक नौकरी मिले। सरकार युवा को एक भीड़ में तब्दील करना चाहती हैं वह युवा को दल में बदल देना चाहती हैं जो उनके मकसद का उद्देश्य पूरा करे वह युवा को विज्ञान नहीं धर्म पढ़ना चाहती है। वह युवा को सवाल नहीं बल्कि चुप रहना सिखाना चाहती हैं क्योंकि सवाल से विज्ञान का जन्म होता है और चुप रहने धर्म के कर्मकांडों को स्थापित होने का मौका मिलता है।
लखनऊ के आग घटना या नीट पेपर लीक मामला इस बात का प्रमाण है कि सरकार को उसके युवाओं की कोई चिंता नहीं है। अब सरकार शिक्षा पर काम करना निरर्थक समझती हैं और धर्म पर काम करना सार्थक। वह शिक्षा को प्राइवेट करना चाहती है लेकिन धर्म को सरकारी।
शिक्षा व्यक्ती की प्राथमिक जरूरत है और प्राथमिक जरूरत पूरा करना सरकार की ज़िम्मेदारी है। अब तक प्राइवेट स्कूल कॉलेज चल रहे हैं जिसे चलना नहीं चाहिए था लेकिन अब प्राइवेट लाइब्रेरी भी जन्म ले रहे हैं क्योंकि लोगों में शिक्षा लेने और नौकरी पेशे में आने की चाहत बढ़ रहीं हैं लेकिन हमारी सरकार को शिक्षा पर काम करने की कोई चाहत महसूस नहीं हो रहीं हैं। जिस तरह सरकारी स्कूल कॉलेज रोज़गार का सृजन करते उसी तरफ सरकारी लाइब्रेरी भी रोज़गार का सृजन करता। इस तरफ रोज़गार का देने-लेने का संतुलन बना रहता पर ऐसी सोच भारत से खत्म हो चुकी है। अगर
लखनऊ में आग लगने वाली लाइब्रेरी सरकारी होती तो ऐसा नहीं होता अगर होता भी तो सरकारें अपनी जवाबदेही तैयार रखती जिससे सिस्टम में आने वाली कमी को ठीक किया जा सकता।
पर अब वक्त आ रहा है दुःख भरे समाचार को सुख में बदलने का क्युकी युवाओं को सरकार की नियत पर शक होने लगा है वह अब ये समझने लगे हैं कि 1 सीट पर 100 लोगों से कंपटीशन नहीं बल्कि युवाओं के साथ धोखा है। एक पेपर को कई बार देने का मतलब सिस्टम में धांधली है।
वह अब अपने हक अधिकार के लिए इक्कठा हो रहे हैं वह अपने रोजगार की गारंटी चाहते हैं जिसे आज नहीं तो कल सरकार को देना ही पड़ेगा।

सीमा भारती, शोध छात्रा, लखनऊ विश्वविद्यालय