पद्म श्री डा.बशीर बद्र
उनका असली नाम सैयद मोहम्मद बशीर था और बशीर बद्र साहब का जन्म 15 फरवरी 1935 में उत्तर प्रदेश के अयोध्या(फैज़ाबाद) में हुआ था। उनके वालिद सय्यद मुहम्मद नज़ीर पुलिस के विभाग में मुलाज़िम थे। बशीर बद्र ने तीसरी जमात तक कानपुर के हलीम मुस्लिम कॅलेज में शिक्षा प्राप्त की जिसके बाद वालिद का तबादला इटावा हो गया जहाँ मुहम्मद सिद्दीक़ इस्लामिया कॅलेज से इन्होंने हाई स्कूल का इम्तिहान पास किया। हाई स्कूल के बाद वालिद के देहांत के सबब उनकी शिक्षा का क्रम टूट गया और उनको 85 रूपये मासिक पर पुलिस की नौकरी करनी पड़ी। वालिद की मौत के बाद घर की ज़िम्मेदारियाँ इन ही के सर पर थीं। उनका रिश्ता वालिद की ज़िंदगी में ही अपनी चचाज़ाद बहन क़मर जहाँ से हो गई थी। पुलिस की नौकरी के दौरान ही उनकी शादी हो गई और तीन बच्चे भी हो गए।
इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (।डन्) चले गए। वहाँ से उन्होंने ग्रेजुएशन, पोस्टग्रेजुएशन और पीएचडी (च्ी.क्.) की डिग्रियां हासिल कीं।
पीएचडी पूरी करने के बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बतौर लेक्चरर उर्दू पढ़ाना शुरू किया। इसके बाद वे मेरठ कॉलेज चले गए, जहाँ उन्होंने लगभग 17 वर्षों तक उर्दू हेड ऑफ डिपार्टमेंट के रूप में सर्विस की।अपनी सरल, सहज और आम बोलचाल की भाषा में दिल को छू लेने वाली ग़ज़लें लिखने के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।
बशीर साहब ने सात साल की कम उम्री से ही शेश्र कहना शुरू कर दिया था। उन्होंने अपने जीवनकाल में 20,000 से अधिक शेरों और लातादाद गज़लें लिखीं।
उन्होंने शायरी को कठिन शब्दों के चंगुल से आज़ाद कराया। उन्होंने आम बोलचाल की सरल और मीठी उर्दू-हिंदी जुबान को अपनाया, जिसे बाद में ‘मखमली बगावत’ भी कहा गया।
बशीर बद्र नई उर्दू ग़ज़ल के नामवर शायर धे।जिन्होंने ग़ज़ल में नई शब्दों को शामिल करते हुए नए संवेदी आकृति तराशे और नए ज़माने के व्यक्ति के मनोविज्ञान और उसके भावात्मक तक़ाज़ों को व्यक्त किया। इन्होंने पारंपरिक विषयों की वैचारिक घेराबंदी और प्रगतिवाद व आधुनिकता की विचारधारा से आज़ाद रहते हुए आम आदमी के रोज़मर्रा के अनुभवों व अवलोकनों को ख़ूबसूरत शे’री अभिव्यक्ति देकर उर्दू भाषीय समुदाय के साथ साथ ग़ैर उर्दू भाषीय समुदाय से भी प्रशंसा प्राप्त किया। ग़ालिब के बाद ग़ैर उर्दू भाषीय समुदाय में सबसे ज़्यादा मशहूर और लोकप्रिय शायर बशीर बद्र हैं। बशीर बद्र की ग़ज़ल का समग्र माधुर्य पूरी तरह अपरंपरागत है। वो महबूब का हुस्न हो या दूसरे मज़ाहिर कायनात, बशीर बद्र ने इन सब का एहसास व अनुभूति एक ऐसे दृष्टिकोण से किया जो पूर्व और समकालीन शायरों से अलग है। बशीर बद्र की ग़ज़लों में एक नाज़ुक नाटकीय स्थिति मिलती है। उनके अशआर महज़ एक वारदात नहीं बल्कि एक कहानी बयान करते हैं जिस पर रूपक या प्रतीक की बारीक नक़ाब पड़ी होती है। वृतांतमक वातावरण रखने वाली सक्रिय आकृति बशीर बद्र की ग़ज़ल की विशेषता हैं। बशीर बद्र का ख़ास कारनामा ये है कि उन्होंने ग़ज़ल में ऐसे अनगिनत शब्द शामिल किए जिनको ग़ज़ल ने उनसे पहले स्वीकार नहीं किए थे। इस मुआमले में बशीर बद्र की कामयाबी का राज़ ये है कि इन्होंने बोल-चाल की ठेठ उर्दू को अपनाया। ऐसी आज़ाद ज़बान में नए शब्दों के खप जाने की गुंजाइश पारंपरिक अरबीकृत व फ़ारसीकृत भाषा की तुलना में ज़्यादा थी। बशीर बद्र की ग़ज़ल में शब्द व संवेदना की सतह पर ताज़गी, शगुफ़्तगी, काव्यात्मकता और सौंदर्य है जो उनकी ग़ज़ल को दूसरे शायरों से अलग करती है।
वर्ष 1987 में मेरठ के सांप्रदायिक दंगों के दौरान उपद्रवियों ने उनका घर जला दिया था। इस त्रासदी में उनकी उम्र भर की कमाई, घर और उनकी कई अनमोल अप्रकाशित पांडुलिपियाँ (किताबों के मसौदे) जलकर राख हो गईं। इस गहरे सदमे के बाद उन्होंने मेरठ छोड़ दिया और हमेशा के लिए भोपाल (मध्य प्रदेश) आकर बस गए।
उनकी प्रमुख प्रकाशित रचनाओं और कविता संग्रहों में शामिल हैं;—
आमद
आहट
आस
उजाले अपनी यादों के
उर्दू अदब में उनके बैजोड़ योगदान के लिए उन्हें कई क़ौमी एवार्ड्स से नवाजा गया-
पद्मश्री (1999)रू भारत सरकार द्वारा चौथा सर्वाेच्च नागरिक सम्मान।
साहित्य अकादमी पुरस्कार (1999)रू उनके कविता संग्रह ‘आस’ के लिए दिया गया।
इसके अलावा उन्हें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा चार बार और बिहार उर्दू अकादमी द्वारा भी सम्मानित किया गया।
अपने जीवन के आखिरी सालों में वे डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) से पीड़ित थे। 28 मई 2026 को भोपाल स्थित उनके निवास पर लंबी बीमारी के बाद 91 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। उन्हें बड़ा बाग कब्रिस्तान भोपाल में सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
डा बशीर बद्र के कुछ चुनिंदा अंशशआरचं़
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
कुछ तो मजबूरियाँ रहीं होंगी
यूँ कोई बे वफ़ा नहीं होता
न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहाँ दरिया समुन्दर से मिला दरिया नहीं रहता

हमीद कानपुरी
कानपुर (उत्तर प्रदेश)