मरी हुई कौम
‘‘मरी हुई कौम’’ का अर्थ केवल उन लोगों से नहीं है जिनकी सांसें थम चुकी हों, बल्कि उससे कहीं अधिक भयावह अर्थ उस समाज का है जो जीवित होते हुए भी अपने अधिकारों, अपने विवेक, अपनी चेतना और अपने भविष्य के प्रति मृतप्राय हो चुका हो। ऐसी कौम के लोग चलते-फिरते हैं, खाते-पीते हैं, काम करते हैं, चुनावों में भाग लेते हैं, उत्सव मनाते हैं, अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं, धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, सामाजिक समारोहों में शामिल होते हैं, लेकिन जब उनके जीवन की बुनियाद पर चोट पड़ती है, जब उनके अधिकारों का हनन होता है, जब उनके बच्चों का भविष्य संकट में पड़ता है, जब व्यवस्था उनके साथ अन्याय करती है, तब वे या तो चुप रह जाते हैं या फिर परिस्थितियों को भाग्य का खेल मानकर स्वीकार कर लेते हैं। इतिहास गवाह है कि किसी भी समाज का पतन बाहरी आक्रमणों से कम और उसकी आंतरिक निष्क्रियता से अधिक हुआ है। तलवारें बाद में हारती हैं, पहले आत्माएँ हारती हैं। जो समाज अन्याय को देखकर मौन हो जाए, जो अपने अधिकारों को भीख समझने लगे, जो प्रश्न पूछने की क्षमता खो दे, जो हर अत्याचार को सामान्य मान ले, वह धीरे-धीरे एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है जहाँ उसके शरीर तो जीवित रहते हैं, लेकिन उसकी सामूहिक चेतना मर जाती है।
किसी राष्ट्र या समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी जनसंख्या नहीं होती, बल्कि उसकी जागरूकता होती है। लाखों-करोड़ों लोगों की भीड़ यदि केवल तमाशबीन बनी रहे तो उसका कोई महत्व नहीं होता। दूसरी ओर, थोड़े से जागरूक लोग भी इतिहास की दिशा बदल सकते हैं। ‘‘मरी हुई कौम’’ की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वह हर घटना को दर्शक की तरह देखती है। उसके सामने शिक्षा महँगी हो जाती है, रोजगार कम होते जाते हैं, भ्रष्टाचार बढ़ता जाता है, सार्वजनिक संसाधन कुछ हाथों में सिमटते जाते हैं, लेकिन वह केवल चर्चा करती है, प्रतिरोध नहीं। वह चाय की दुकानों पर बहस करती है, मोबाइल पर संदेश साझा करती है, घरों में शिकायतें करती है, लेकिन जब सामूहिक रूप से आवाज़ उठाने का समय आता है तो वह भीड़ में गुम हो जाती है। उसके भीतर यह भावना घर कर जाती है कि ‘‘हमारे बोलने से क्या होगा?’’ और यही वाक्य किसी भी समाज की मृत्यु का प्रारंभिक शिलालेख बन जाता है।
कल्पना कीजिए एक गाँव की, जहाँ एकमात्र विद्यालय धीरे-धीरे बदहाल होता जा रहा है। शिक्षक कम हैं, भवन जर्जर है, बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल रही। माता-पिता सब कुछ देख रहे हैं, लेकिन कोई आवाज नहीं उठाता। हर व्यक्ति सोचता है कि उसका बच्चा किसी तरह पास हो जाए, बाकी समाज की समस्या समाज जाने। दस वर्ष बाद वही बच्चे बेरोजगार होकर गाँव में घूमते हैं। तब लोग कहते हैं कि सरकार ने कुछ नहीं किया। लेकिन प्रश्न यह भी है कि समाज ने क्या किया? क्या उसने अपने अधिकार के लिए संगठित होकर संघर्ष किया? क्या उसने शिक्षा को प्राथमिकता बनाने की माँग की? यदि नहीं, तो यह केवल व्यवस्था की विफलता नहीं, समाज की निष्क्रियता भी है। एक मरी हुई कौम का यही चरित्र होता है कि वह भविष्य को वर्तमान की सुविधा के लिए गिरवी रख देती है।
ऐसे समाजों में अन्याय धीरे-धीरे सामान्य बन जाता है। पहले लोग किसी भ्रष्टाचार की घटना पर आक्रोशित होते हैं, फिर वे उसे स्वीकार कर लेते हैं। पहले रिश्वत अपवाद होती है, फिर परंपरा बन जाती है। पहले अन्याय पर शर्म आती है, फिर लोग उसे जीवन की अनिवार्यता मान लेते हैं। धीरे-धीरे नैतिकता का स्तर इतना गिर जाता है कि लोग अन्याय के विरोधी नहीं, उसके अनुकूल बन जाते हैं। वे स्वयं भी वही करने लगते हैं जिसकी शिकायत कभी किया करते थे। जब समाज का नैतिक विवेक मरने लगता है तो कानून भी उसे जीवित नहीं रख सकता।
इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ समाजों ने अपनी निष्क्रियता की भारी कीमत चुकाई। जब-जब जनता ने अपने अधिकारों की रक्षा का दायित्व दूसरों पर छोड़ दिया, तब-तब सत्ता निरंकुश हुई। जब लोगों ने सोचना बंद किया, तब कुछ लोगों ने उनके लिए सोचना शुरू कर दिया। जब लोगों ने प्रश्न पूछना बंद किया, तब उत्तर देने वालों ने स्वयं को मालिक समझ लिया। किसी भी युग में स्वतंत्रता केवल संविधान की देन नहीं रही; वह सतत जागरूकता की देन रही है। जिस दिन जनता यह मान लेती है कि स्वतंत्रता स्थायी रूप से मिल गई है और अब उसकी रक्षा की आवश्यकता नहीं, उसी दिन उसके क्षरण की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है।
मरी हुई कौम की एक और पहचान है- वह व्यक्तियों की पूजा करती है और सिद्धांतों को भूल जाती है। वह किसी नेता, किसी संस्था, किसी समूह या किसी प्रभावशाली व्यक्ति को इतना बड़ा बना देती है कि उसके सामने सत्य भी छोटा लगने लगता है। वह आलोचना को शत्रुता समझती है और प्रश्न को अपराध। परिणाम यह होता है कि गलतियाँ सुधारने के बजाय बढ़ती चली जाती हैं। स्वस्थ समाज व्यक्ति से बड़ा सिद्धांत को मानता है, जबकि मृतप्राय समाज सिद्धांत से बड़ा व्यक्ति को मानने लगता है। वहां तर्क नहीं, भावनाएँ शासन करती हैं; तथ्य नहीं, नारे निर्णय लेते हैं।
एक किसान की कल्पना कीजिए जिसकी भूमि धीरे-धीरे बंजर होती जा रही है। उसे पता है कि पानी का स्रोत समाप्त हो रहा है, मिट्टी की उर्वरता घट रही है, लागत बढ़ रही है। लेकिन यदि वह कोई सामूहिक प्रयास नहीं करता, कोई माँग नहीं उठाता, कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं खोजता और केवल भाग्य को दोष देता रहता है, तो अंततः उसकी अगली पीढ़ी खेती छोड़ने को मजबूर हो सकती है। इसी प्रकार जब एक पूरी पीढ़ी शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और न्याय जैसे प्रश्नों पर मौन हो जाती है, तो अगली पीढ़ी उसके मौन की कीमत चुकाती है।
यह भी सत्य है कि हर विरोध सड़क पर उतरकर ही नहीं किया जाता। विरोध का अर्थ हिंसा नहीं है। विरोध का सबसे बड़ा रूप जागरूकता है, प्रश्न पूछना है, सत्य को स्वीकार करना है, अन्याय को अन्याय कहना है। लेकिन मरी हुई कौम इन सबसे बचती है। वह सुविधा का जीवन चाहती है, भले ही उसके बदले उसे सम्मान खोना पड़े। वह तात्कालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक हानि को स्वीकार कर लेती है। उसे अपने बच्चों के भविष्य से अधिक वर्तमान की छोटी-छोटी सुविधाओं की चिंता होती है।
कभी-कभी यह मृत्यु अचानक नहीं आती। यह धीरे-धीरे फैलती है। पहले लोग सार्वजनिक मुद्दों से उदासीन होते हैं, फिर वे सामाजिक उत्तरदायित्व से दूर होते हैं, फिर वे केवल व्यक्तिगत लाभ की भाषा समझते हैं। समाज का सामूहिक चरित्र टूटने लगता है। लोग नागरिक कम और उपभोक्ता अधिक बन जाते हैं। उन्हें अपने अधिकारों से अधिक छूट, अपने कर्तव्यों से अधिक लाभ और अपने भविष्य से अधिक वर्तमान मनोरंजन की चिंता होने लगती है। ऐसे समय में समाज बाहर से चमकदार दिखाई दे सकता है, लेकिन भीतर से खोखला हो चुका होता है।
किसी भी कौम की मृत्यु उसकी आर्थिक गरीबी से नहीं होती। दुनिया में अनेक गरीब समाज रहे हैं जिन्होंने संघर्ष करके अपने लिए बेहतर भविष्य बनाया। मृत्यु तब होती है जब समाज आशा छोड़ देता है, जब वह अन्याय को नियति मान लेता है, जब वह अपने बच्चों को यह सिखाने लगता है कि ‘‘सिस्टम ऐसा ही है, कुछ नहीं बदल सकता“ यही वाक्य सबसे खतरनाक है, क्योंकि यह परिवर्तन की संभावना को ही समाप्त कर देता है।
जीवित कौम और मरी हुई कौम में अंतर केवल इतना है कि जीवित कौम गलतियों को पहचानती है और उन्हें सुधारने का प्रयास करती है, जबकि मरी हुई कौम गलतियों के साथ जीना सीख लेती है। जीवित कौम अपने भविष्य के लिए असुविधा सह सकती है, संघर्ष कर सकती है, संवाद कर सकती है, संगठन बना सकती है और परिवर्तन की माँग कर सकती है। मरी हुई कौम केवल प्रतीक्षा करती है- किसी मसीहा की, किसी चमत्कार की, किसी ऐसे व्यक्ति की जो आकर उसकी सारी समस्याएं हल कर दे। लेकिन इतिहास बताता है कि किसी समाज को स्थायी रूप से कोई मसीहा नहीं बचाता; उसे उसकी जागरूक जनता बचाती है।
इसलिए ‘‘मरी हुई कौम’’ केवल एक व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी है। यह चेतावनी हर उस समाज के लिए है जो अपने अधिकारों के प्रति उदासीन हो रहा है, जो प्रश्न पूछने से डर रहा है, जो अपने भविष्य को दूसरों के भरोसे छोड़ रहा है। जिस दिन लोग यह समझ लेते हैं कि उनका मौन भी इतिहास लिखता है, उसी दिन पुनर्जागरण शुरू होता है। और जिस दिन वे यह मान लेते हैं कि उनके बोलने या न बोलने से कोई फर्क नहीं पड़ता, उसी दिन पतन की प्रक्रिया तेज हो जाती है। किसी कौम की वास्तविक मृत्यु तब नहीं होती जब उसके लोग मरते हैं; उसकी वास्तविक मृत्यु तब होती है जब उसके लोग अन्याय देखकर भी चुप रहना सीख जाते हैं, अपने अधिकार खोकर भी संतुष्ट रहना सीख जाते हैं और अपने बच्चों का भविष्य कुचलते देखकर भी यह कह देते हैं- ‘‘हमें क्या लेना-देना।’’ यही वह क्षण है जब इतिहास उन्हें जीवित मनुष्यों की भीड़ नहीं, बल्कि एक मरी हुई कौम के रूप में याद करता है।
यह लेख पढ़ सुन कर भी शायद उस कौम के लिए चिंता के साथ ही चिकित्सा की जरूरत है?

डॉ. राम अवध कुशवाहा