भूलने नहीं देगा
काफी इंतजार करवाने और मन में गहरी हताशा पैदा करने के बाद आषाढ़ वद दूज की पिछली देर रात अचानक बारिश शुरू हुई। बरसात की ठंडी हवा लगते ही मैं फुर्ती से जाग गया और खिड़की के पास जाकर हाथ बढ़ाकर खड़ा हो गया। चंपा, बादाम और सप्तपर्णी के ऊंचे-ऊंचे झूलों पर बारिश की धारें पड़ रही थीं और फिर धरती पर टप-टप गिरकर बह जाती थीं। खिड़की के पास खड़े-खड़े ही मेरे शरीर का कण-कण भीगी मिट्टी के मुलायम कणों जैसा हो गया था। अगर इसी तरह सारी रात बारिश होती रहती तो सारी रात जागते रहने की मेरी तैयारी थी। मगर जिस तरह देर रात अचानक बारिश शुरू हुई थी, उसी तरह सुबह-सुबह वह अचानक थम भी गई।
देर सुबह हल्की धुंधली रोशनी में सारे पेड़-पौधे ऐसे लग रहे थे मानो पानी पी-पीकर तृप्त हो गए हों और प्रसन्न दृष्टि से मेरी ओर देख रहे हों। उनकी ताजी, कोमल हरियाली और चमकते हुए हरे रंग को छूने, सहलाने का मन हो आया, पर पेड़ों की इतनी ऊंची चोटियों तक पहुंचूं भी तो कैसे! बस जूही और मधुमालती को प्यार से छूकर लौट आया।
सुबह चाय के लिए मैं डाइनिंग टेबल पर अंबर का इंतजार कर रहा था। वह समय का बहुत पाबंद और नियमित था, फिर भी उसे आने में पांचेक मिनट की देर हो गई थी। मेरा अखबार पढ़ने का मन नहीं हुआ। मैंने सोचा, चलो रसोई में जाकर देखूं कि इस बारिश भरी ठंडी सुबह में महाराज कौन-सी डिश बनाने वाले हैं। तभी अंबर आ पहुंचा।
“गुड मॉर्निंग पापा, सॉरी पापा फॉर बीइंग लेट।” कहकर उसने नाश्ता लिए बिना सीधे चाय पीनी शुरू कर दी।
सबकी तरह मुझे भी ऐसा ही लगता था कि अंबर में मुझसे ज़्यादा उसकी मां की छाप थी, मगर उसके जीवन का ढंग मालविका से अलग था। मालविका को पशु-पक्षी और फूल-पौधे बहुत प्रिय थे। हमारे आंगन में लगे किसी भी पौधे में नया छोटा-सा पत्ता फूटता या कोई कली खिलती, तो वह देखकर पागलों की तरह खुश हो जाती थी। इसलिए मेरी इच्छा थी कि अंबर बड़ा होकर बॉटनी या जूलॉजी में आगे पढ़ाई करे और किसी बड़े बॉटनिकल गार्डन या नेशनल पार्क का सुपरिटेंडेंट बने। मेरी यह भी बड़ी इच्छा थी कि मेरी मालविका को बहुत पसंद आने वाले स्पाइडर ऑर्किड के पेड़ बगीचे में उगाऊं और दक्षिण आस्ट्रेलिया के रंग-बिरंगे तोते आंगन में उड़ते फिरें। उसकी याद में इतना तो किया ही जा सकता था।
मेरी फार्मास्यूटिकल कंपनी अच्छी चलती थी। हर तरह की सुख-सुविधाएं मिल जाएं, इतनी आमदनी थी और काम भी हल्का था, इसलिए अंबर पर बहुत पैसे कमाने की बड़ी जिम्मेदारी नहीं थी। मगर वह सी.ए. करने के बाद एम.कॉम., फिर एम.बी.ए. और कंप्यूटर में एम.सी.ए. करने की बातें करता था। मेरे मन में आता था कि पैसे कमाने की इस तनावभरी बड़ी दौड़ में शामिल होने की क्या जरूरत है! मगर अंबर की उड़ान ऊंची थी। वह अक्सर मुझसे कहता था कि उसका अलग होना बहुत जरूरी है, बल्कि वही उसका जीवन है। मैं उसकी यह बात भी मान लेता था कि जीवन जीने की अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार करने की उसकी प्रबल इच्छा और उत्कटता से ही उसका स्वाभिमान और आत्मविश्वास जन्म लेता है। वह मुझसे बहुत आगे निकल जाना चाहता था, मगर साथ ही मुझे बहुत सम्मान भी देता था। पिता के प्रति उसका विनय और आदर कभी कम नहीं हुआ। आख़िर में वह वही करता जो मैं कहता। उसने कभी अपनी मर्यादा या लक्ष्मणरेखा का उल्लंघन नहीं किया। पढ़ाई और कैरियर के अलावा लगभग हर बात में वह मेरा कहना मानता था।
जब वह पांच-छह साल का था, तब मालविका अचानक फाल्सीपेरम के जहरीले बुखार में हमें अकेला छोड़कर चली गई थी। उसके बाद मैंने ही मां और पिता, दोनों की ज़िम्मेदारी पूरी निष्ठा और कुशलता से निभाकर अंबर को सर्वोत्तम ढंग से पालने का निश्चय किया था। अवसर था या नहीं, इसकी परवाह किए बिना मैंने दूसरा विवाह नहीं किया।
घर के छोटे-बड़े सारे काम मैंने स्वयं सीख लिए थे। मैं किसी पर निर्भर नहीं था, आत्मनिर्भर था। नौकर-चाकर रखे थे, मगर उनका सबसे छोटा से छोटा काम मुझे आता था। बल्कि मन ही मन मैं मानता था कि वह काम मैं उनसे बेहतर कर सकता हूं। खाना बनाने के लिए महाराज थे, मगर मैं स्वयं भी बहुत अच्छा खाना बना सकता था। मुझे पुरुष होने की कोई लाचारी या परायापन महसूस नहीं होता था। मैं किसी तरह का दयनीय भाव भी महसूस नहीं करना चाहता था।
आमतौर पर चाय पीकर अंबर तुरंत चला जाता था। वह मुझसे ज्यादा व्यस्त था, मगर उस दिन पांच मिनट देर होने के बावजूद बैठा रहा और खिड़की के बाहर देखता रहा। बाहर हवा में बारिश की फुहारें सुंदर झिलमिलाहट पैदा कर रही थीं। आकाश बादलों से घिरा हुआ था, फिर भी उसके चेहरे पर हल्की चमक थी। मुझे आश्चर्य हुआ। बाहर क्या है यह देखने की उसे शायद ही कभी फुरसत होती थी। वह मन ही मन कुछ सोच रहा था, फिर अचानक बोला, “पापा, मैंने हमारी शाह एंड शाह एसोसिएट्स छोड़कर सी.ए. के रूप में परिख एंड कंपनी जॉइन करने का निर्णय किया है। वहाँ सैलरी और सुविधाएं ज्यादा हैं, और साथ ही कंप्यूटर में एम.सी.ए. करने की सुविधा भी देंगे। एम.के. अंकल को थोड़ा बुरा लगेगा, मगर परिख एंड कंपनी जॉइन करना मेरे हित में है।”
मुझे थोड़ी हैरानी हुई, मगर मैंने तुरंत कहा, “तुम्हें जो करना हो खुशी से करो। यह तुम्हारा सवाल है, तुम्हारे कैरियर का सवाल है, इसलिए निर्णय भी तुम्हें ही लेना चाहिए और वह तुम्हारा अपना निर्णय होना चाहिए। मैं मधुकर को बाद में फोन कर दूंगा, तुम उनकी चिंता मत करो।”
मधुकर मेरा पुराना आत्मीय मित्र था। अंबर जब सी.ए. हुआ था, तब मैंने ही उससे कहा था कि उसे अपनी कंपनी में रख ले। वैसे भी अंबर पूरी तरह योग्य था, इसलिए मन मारकर मैंने इसे स्वीकार कर लिया था।
मुझे लगा कि अंबर अभी भी कुछ और कहना चाहता है। वह बारबार कनखियों से मेरी ओर देख रहा था। फिर अचानक जैसे हिम्मत जुटाकर जल्दी-जल्दी बोला, “पापा, मैं बहुत दिनों से आपसे एक बात कहना चाहता था। अभी हमारी कंपनी में बनिता नाम की एक लड़की है। वह भी सी.ए. कर रही है, बहुत होशियार है, देखने में भी अच्छी है। मुझे पसंद है। मैं उससे शादी करना चाहता हूं। उसकी मम्मी को भी कोई आपत्ति नहीं है। अगर आप हां कहें तो इस रविवार शाम को उन्हें घर बुलाऊं?”
यह सुनकर मैं स्तब्ध रह गया। मेरे सामने बैठे मेरे इकलौते बेटे अंबर ने अनजाने में मुझे एक ही क्षण में बड़ी दुखद और उलझनभरी स्थिति में डाल दिया। भारी मन से धीमे स्वर में मैंने कहा, “सॉरी अंबर, अगर सिर्फ सहमति की बात है, तो मेरी सहमति नहीं है। इसलिए उन्हें घर बुलाने की कोई जरूरत नहीं है।”
अंबर अविश्वास से मेरी ओर देखता रह गया। उसके चेहरे से साफ था कि जैसे उस पर अचानक वज्रपात हुआ हो। उसका चमकता चेहरा एकदम मुरझा गया। वह टूटे हुए स्वर में बोला, “पापा, आप मना क्यों कर रहे हैं? क्या हमारे स्टाफ में किसी ने बनिता के बारे में कुछ कहा है? या फिर एम.के. अंकल ने कुछ।”
उसके आगे बोलने से पहले ही मैंने कहा, “नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। पिछले अप्रैल में तुम्हारी चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की पार्टी थी, तब मैंने उसे तुम्हारे साथ दूर से देखा था। उसके बारे में और उसकी मां के बारे में भी मुझे पूरी जानकारी है। अंबर इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कहना चाहता। मैं तुम्हें उससे शादी करने की अनुमति नहीं दे सकता बस।”
अगले दिन वही हुआ, जिसकी मुझे उम्मीद थी। बनिता की मां का फोन आया। मैंने रिसीवर उठाया तो उधर से धीमा कांपता स्वर आया, “मैं बनिता की मम्मी अनुराधा बोल रही हूं। अगर आपको आपत्ति न हो तो क्या मैं आपसे बात कर सकती हूं?”
इतने लंबे समय बाद भी उसकी आवाज वैसी ही थी। मैंने बिना कोई विशेष प्रतिक्रिया दिए कहा, “हां, बोलिए।”
वह टूटी हुई धीमी आवाज में बोली, “अभी फोन पर आपसे बात करते हुए बहुत संकोच हो रहा है। लेकिन आपने मुझे पहचाना तो होगा ही?”
मैंने तुरंत उत्तर दिया, “सामने मिलूं या दूर से देखूं, आपको पहचान लूं इतनी याद तो है ही।”
कुछ रुककर, झिझककर वह बोली, “कुछ ऐसा हो गया है, जिस पर विश्वास नहीं होता। अंबर ने आपको बनिता के बारे में बताया होगा। वह कल शाम मुझसे मिला था। कह रहा था कि आपको बनिता के लिए मंज़ूरी नहीं है और…।”
मैंने तुरंत उसकी बात काट कर बीच में कहा, “हां, ठीक है, मेरी मंज़ूरी नहीं है, और साथ ही।”
मैं बोलते-बोलते रुक गया। हमारे बीच फोन पर ही तनावपूर्ण चुप्पी छा गई। मैं रिसीवर रख दूं या नहीं, सोच ही रहा था कि वह नरम स्वर में बोली, “मैं इस बारे में आपसे कुछ कहना चाहती हूं। मैं आपसे अकेले मिलना चाहती हूं।”
मुझे आश्चर्य हुआ। मुझे लगा कि अब मिलने का कोई अर्थ नहीं है, इसलिए मैंने कहा, “जो कहना है, अभी फोन पर ही कह दीजिए।”
फिर चुप्पी छा गई। उसने रिसीवर नहीं रखा। संकोचभरे कांपते स्वर में बोली, “जो कुछ कहना है, वह इतनी जल्दी फोन पर नहीं कह सकती और ठीक भी नहीं लगेगा। ऐसा तो नहीं कि आप मेरा चेहरा ही नहीं देखना चाहते?”
“नहीं, ऐसी बात नहीं है।” मैंने कहा।
“तो अगले रविवार आऊं?” उसने आतुरता से पूछा।
मैंने कहा, “ठीक है, आइए।”
रविवार शाम को भी हल्की बारिश हो रही थी। कभी केवल चेहरा और हाथ भिगो देने वाली हवा जैसी फुहार उड़ती थी, तो कभी गिने जा सकने जितनी बड़ी-बड़ी दस-बारह बूंदें एक साथ गिरती थीं। मुझे बारिश के ये दोनों रूप सबसे प्रिय थे, एक ऐसी भीगी-भीगी उड़ती फुहार और दूसरा गरजते हुए मूसलाधार बरसते बादल।
पता नहीं क्यों, इतने वर्षों बाद अनुराधा मुझसे मिलने आने वाली थी, फिर भी मन में न कोई उत्तेजना थी, न यह जानने की उत्सुकता कि अब वह कैसी दिखती होगी। उसने फोन पर ठीक कहा था, कुछ ऐसा हो गया था, जिस पर विश्वास नहीं होता। फिर भी यह कैसा संयोग, कैसा ऋणानुबंध, कैसी विधि की विचित्रता, मैं कुछ नहीं सोचना चाहता था। बस इतना कि जो हुआ वह मुझे स्वीकार नहीं।
रविवार शाम अनुराधा आई और बिना कुछ बोले देर तक बैठी रही। जैसे पहली बार मुझे देख रही हो, वैसे मेरी ओर देखती रही। उसके चेहरे पर उम्र का अधिक असर नहीं था। आखिर उसने साड़ी का पल्लू मरोड़ते हुए धीमे स्वर में कहा, “आपको मुझसे कुछ नहीं कहना?”
मुझे आश्चर्य हुआ। फोन पर तय हुआ था कि उसे कुछ कहना है। अंबर-बनिता के बारे में उसे बात करनी थी। मैंने शांत स्वर में कहा, “नहीं, मुझे कुछ नहीं कहना।”
फिर वह कुछ सोचकर बोली, “क्या आपको आज भी मुझसे रंज है? आपके मन का दुख…।”
मैंने बीच में ही रोक दिया, “देखो अनुराधा, मैं यही बात नहीं करना चाहता था, इसलिए मिलना भी नहीं चाहता था। मैं आज पूरी तरह शांत हूं, सुखी हूं, लेकिन तुमने पूछा है तो कह दूं, हां, तुम्हारी वजह से मैं बहुत बेचैन हुआ था। मैं तुम्हें प्रेम करता था, मगर मुझे पता नहीं था कि तुम मुझसे प्रेम नहीं करती थीं। तुम यह तो मानोगी कि हमारे बीच कुछ न कुछ संबंध था। इसलिए मैंने तुमसे विवाह की बात की थी। मगर तुमने कोई उत्तर नहीं दिया था। तुमने मेरी भावना ठुकरा दी थी। तुम्हें पूरा अधिकार था, मगर कारण तो बता सकती थीं। बिना कुछ कहे मुझे धक्का दे दिया। मैंने बहुत अपमान और हीनता महसूस की थी।”
मैं बोलता गया, मगर बाद में लगा कि यह सब कहने की जरूरत नहीं थी। अनुराधा गंभीरता से सुनती रही। फिर अचानक उठकर मेरे पास आई और बोली, “आपको क्या बताऊं। उस समय मैं ऐसी विचित्र परिस्थिति में थी कि।”
मैंने फिर रोक दिया, “बस, अब मुझे कुछ नहीं सुनना। लेकिन आज एक बात कहूं, तुम्हारे मना करने के बाद मालविका मेरे जीवन में आई। उसने मुझे अपार सुख दिया। पत्नी के रूप में उसने अपने हृदय का संपूर्ण प्रेम मुझे दिया। दस साल के छोटे-से वैवाहिक जीवन में उसने मुझे वह सब दिया, जो एक स्त्री अपने प्रिय पुरुष को दे सकती है। उसका अचानक मृत्यु को प्राप्त होना मेरे जीवन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य था। मगर उसने मेरे जीवन को धन्य कर दिया।”
अनुराधा भी भीतर कहीं डूब गई थी। उसने धीमे स्वर में कहा, “उनकी अचानक मृत्यु हुई, तब मैं आपसे मिलने आना चाहती थी, मगर हिम्मत नहीं हुई।”
मैंने कहा, “और तुम्हारे पति पाराशर के कार दुर्घटना में निधन का समाचार पढ़कर मुझे भी दुख हुआ था, मगर तब भी तुमसे मिलने का विचार नहीं आया।”
फिर मैंने कहा, “लेकिन हम अपनी ही बातें करने लगे हैं। तुम अंबर-बनिता के बारे में जो कहना चाहती थीं वही कहो।”
अनुराधा बोली, “पहले एक विनती करूं? आप मुझे इतने आदर से ‘आप’ और ‘अनुराधा’ कहकर बुलाते हैं, यह अजीब लगता है। क्या पहले की तरह ‘तू’ या ‘अनु’ नहीं कह सकते?”
मैंने तुरंत कहा, “अगर ऐसा करूं तो अब तक जो कुछ कहा, वह सब व्यर्थ हो जाएगा। इसलिए अब बनिता के बारे में ही कहो।”
बाहर एक चिड़िया आकर स्पीकर पर चोंच मार रही थी। उसे देखते हुए अनुराधा धीमे स्वर में बोली, “जब अंबर ने कहा कि आपको मंजूर नहीं है तो मुझे बहुत दुख हुआ। आज मैं आपके पास सिर्फ बनिता की मां बनकर आई हूं। मुझे पता है कि आप मेरी वजह से बनिता को मना कर रहे हैं। मगर बनिता में कोई दोष नहीं है, तो उसका क्या अपराध?”
मैंने कुछ कठोर होकर कहा, “मैंने बनिता के बारे में कोई राय नहीं दी।”
अनुराधा तुरंत बोली, “मैं जानती हूं। इसलिए तो आई हूं। शुरुआत में मेरी भी मंज़ूरी नहीं थी, मगर बनिता नहीं मानी। वह अंबर से बहुत प्रेम करती है। उसके बिना नहीं रह सकती और आपको तो प्रेम की पीड़ा का पता है। अंबर भी उससे उतना ही प्रेम करता है।”
मुझसे रहा नहीं गया। मैंने कहा, “लेकिन अंबर ने तो मुझसे यह नहीं कहा कि वह बनिता से प्रेम करता है। उसने तो सिर्फ शादी की अनुमति मांगी थी।”
अनुराधा जैसे इसी बात की प्रतीक्षा कर रही थी। वह तुरंत बोली, “तो अगर अंबर खुद आकर आपसे कहे कि वह बनिता से प्रेम करता है, तो आप मना नहीं करेंगे न?”
उसके इस सवाल ने मुझे बड़ी नाजुक स्थिति में डाल दिया। मगर मैं प्रेम की सच्चाई और उसकी पीड़ा का अनादर नहीं करना चाहता था। थोड़ा सोचकर मैंने कहा, “हां, अगर अंबर खुद मुझसे कहे कि वह बनिता से प्रेम करता है, तो मैं इस विवाह के लिए हां कह दूंगा। इतना ही नहीं, बनिता को इस घर की बहू के रूप में पूरे सम्मान और स्नेह से स्वीकार करूंगा। मगर मेरी एक शर्त है।”
मेरे आगे कुछ कहने से पहले ही अनुराधा उत्साह से बोली, “हां, हां, कहिए आपकी जो भी शर्त होगी, मुझे मंज़ूर है।”
मैंने शांत स्वर में कहा, “लेकिन उसके बाद मैं तुम्हारे साथ किसी भी प्रकार का संबंध नहीं रखूंगा।”
अनुराधा का चेहरा एकदम उतर गया। कांपते स्वर में उसने पूछा, “क्यों?”
मैंने उत्तर दिया, “हमारा नया संबंध पुराने संबंध को भूलने नहीं देगा।”

वीरेंद्र बहादुर सिंह
जेड-436ए, सेक्टर-12,
नोएडा-201301 (उ.प्र.)