लघु कथा

निर्मलता

पहले हमें लोग कितना मानते थे जीजी! घाट पर आकर प्रतिदिन दीप जलाते, स्नान कर के अपने शरीर को शुद्ध करते; साथ ही साथ किनारे बैठ कर ठंडी-ठंडी पुरवाई का आनंद भी लेते थे। कितने अच्छे दिन थे….पैरी की आँखें भर आईं।

‎ हाँ! पैरी बहन दुख–सुख बाँटते, अब न पेड़ों की छाया न कोई इंसान। कूड़ादान बना रखा है हमें।

‎आप कैसी हैं जीजी…दोनों बहनों ने बड़ी जीजी से पूछने की हिम्मत जुटाई।

‎हाँ बहनों! मेरा भी यही हाल है, अब मेरे जल में स्नान करने लोग कभी-कभी ही आते हैं और उसके बाद भी लोग अपने-अपने घरों में या पास लगे नलकूपों से स्वयं को पुन: पवित्र करते हैं । इंसानों की सुविधाएं हमें और भी पीछे छोड़ती नजर आ रही हैं। चारों तरफ सूखा ही सूखा है। इतना कह कर‌ बड़ी जीजी का गला भर आया। ख़ैर छोड़ो…. लोग जैसे भी रहें लेकिन हमें अपनी अच्छाई नहीं छोड़नी चाहिए।

‎ हमारा जल आज भी पवित्र है और कल भी रहेगा; उनके गंदगी फैलाने से हम गंदे नहीं हो जाएंगे, अभी भी लाखों जीव हमारे अंदर रह कर जीवन यापन कर रहे हैं, हमें उन पर भी ध्यान देना चाहिए न! क्या हुआ शहरों में गंदगी है तो…आगे जंगल–झरनों में तो हमारा जल पवित्र है ही। आज भी अमृत है। सदैव अच्छी सोच रखो बहनों। हाँ! जीजी लेकिन हमारी इतनी पतली धार में इन बेचारे नन्हे जीवों का जीवन खतरे में है इनका क्या करें? इतना बोलते ही जोरों की बारिश होने लगी। भगवान ने हमारी व्यथा सुन ली जीजी! फिर क्या…. महानदी, पैरी और सोंढूर तीनों बहनों की पतली धारा, मोटी धारा में बदल कर एक-दूसरे में समाहित होकर मुस्कुराते हुए मंजिल की तरफ प्रवाहित होने लगीं।

प्रिया देवांगन “प्रियू”
‎राजिम
‎जिला – गरियाबंद
‎छत्तीसगढ़

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *