खिलौने
खिलौनेवाला जैसे ही जाने को तैयार हुआ, उसकी सात वर्षीय बेटी ने साहस बटोरते हुए धीरे से कहा, ‘‘बापू ….!’’
‘‘हाँ! बोल बेटा …..!’’ खिलौनेवाले ने उसका सिर चूमते हुए कहा।
‘‘बापू…..! मुझे भी ऐसा एक खिलौना खेलने के लिए चाहिए।’’ उसने एक खिलौने की ओर ऊॅंगली से इशारा करते हुए कहा।
‘‘बेटा! यह खिलौना तुम्हारे खेलने के लिए नहीं, बेचने के लिए है।’’ उसने अपनी मज़बूरी बताते हुए कहा।
‘‘बापू! मेरे भी तो इससे खेलने के दिन हैं। क्या, मेरा बचपन खिलौनों से खेले बग़ैर यों ही गुज़र जाएगा?’’ उसने रूठते हुए प्रश्न किया।
‘‘बेटा! ऐसी बात नहीं है। पर……बेटा! यदि इसमें से एक भी खिलौना तुम्हें खेलने के लिए दे दिया तो….. शाम को हमारा चूल्हा नहीं जलेगा।’’ उसने बेटी को समझाते हुए अपनी मज़बूरी बताई।
इतना कहते-कहते उसकी आँखे छलछला आईं! और सारे घर में सन्नाटा पसर गया।

अशोक आनन, मक्सी ( शाजापुर )