असम से आगरा की ओर
जीवन में कुछ यात्राएँ केवल दूरी तय करने के लए नहीं होतीं, बल्कि वे मनुष्य के भीतर छपे साहस, सपनों और आत्मविश्वास को भी एक नई दिशा देती हैं। मेरी आगरा यात्रा भी मेरे जीवन की ऐसी ही एक अविस्मरणीय यात्रा है, जिसने मुझे केवल शिक्षा ही नहीं दी, बल्कि जीवन को समझने की नई दृिष्ट भी प्रदान की। यह यात्रा मेरे लिए एक साधारण सफर नहीं, बल्कि संघर्ष, भावनाओं, आध्याित्मक अनुभूतयों और आत्मविश्वास से भरी एक जीवन-यात्रा बन गई।
मेरी यात्रा असम के छोटे से गाँव दक्षिण लस्कर पथार से आरम्भ हुई। इस यात्रा में मेरे अंकल का मागदर्शन अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। ठ.म्क की पढ़ाई के लिए केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा जाना मेरे जीवन का एक नया अध्याय था। पहली बार घर और परिवार से इतनी दूर जाना मेरे लिए अत्यंत भावुक क्षण था। मन में एक ओर नए सपनों की उत्सुकता थी, तो दूसरी ओर अपनों से दूर होने की हल्की उदासी भी थी। घर से निकलते समय माता-पता की आँखों में चिंता, स्नेह और आशीर्वाद एक साथ दिखाई दे रहे थे।
मेरे पिता ने मुझे मेरे अंकल के साथ भेजना उचित समझा, क्योंकि वे स्वयं एक शिक्षक हैं, और उन्हें शिक्षा तथा बाहर की व्यवस्थाओं की अच्छी जानकारी है। मेरी दादी भी मुझे छोड़ने के लिए मेरे अंकल के घर गई थीं। मैं वहाँ एक दिन रुकी और अगले दिन मैं और मेरे अंकल आगरा के लिए रवाना हुए। दादी हमें छोड़ने के लिए लगभग स्टेशन तक आई थीं। उस समय उनके चेहरे पर स्नेह, और उदासी दोनों छाएं हुए थे। फिर मैंने अपनी दादी के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेकर अपनी यात्रा की शुरुआत की…. और फिर दिनांक २ जून को हमारी यात्रा शुरू हुई और ३ जून २०२५ को हम आगरा पहुँचे। पूरे सफर में मेरे अंकल ने मेरा ठीक वैसे ही ध्यान रखा, जैसे एक पता अपनी बेटी का रखते हैं। उनके स्नेह, अपनापन और मागदर्शन ने मेरी यात्रा को और भी सुरक्षित, सहज और यादगार बना दिया।
ट्रेन का वह सफर आज भी मेरी स्मृितयों में जीवित है। खिड़की से बाहर बदलते दृश्य, छोटे-छोटे स्टेशन, खेतों की हरियाली और लोगों की चहल-पहल मेरे मन को आकर्षित कर रही थी। रास्ते में जब भी खाने-पीने की कोई चीज़ आती, मेरे अंकल मुझसे पूछते की मुझे क्या खाना है… उनका स्नेह और देखभाल मेरे लिए किसी पिता के प्रेम से कम नहीं था। रास्ते में और कॉलेज में कई लोग मुझसे पूछते थे – ‘‘क्या आप अपने पापा के साथ आई हैं?’’ तब मैं गर्व से मुस्कुराकर कहती थी – ‘‘नहीं, ये मेरे अंकल हैं।’’
उस समय मेरे मन में उनके प्रति सम्मान और भी बढ़ जाता था। यात्रा के दौरान मेरे अंकल ने मुझे ‘‘डॉ. रुबुल माउत’’ द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘मोरो एटा सपोन आछे’’ पढ़ने के लिए दी। यह पुस्तक गरीबी की सीमाओं को पार कर अमेरिका के मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय तक पहुँचने की प्रेरणादायक कहानी है। मैं ट्रेन में बैठकर उसी पुस्तक को पढ़ रही थी। पुस्तक के प्रत्येक शब्द मेरे मन को गहराई से छू रहे थे। उस संघर्षपूर्ण जीवन-कथा ने मुझे यह विश्वास दिलाया की कठिन परिस्थतियाँ कभी भी सपनों को रोक नहीं सकतीं। उस पुस्तक ने मेरे भीतर नई ऊर्जा, नई आशा और आगे बढ़ने का साहस भर दिया। मुझे ऐसा महसूस हुआ मानो यह यात्रा केवल आगरा तक पहुँचने की यात्रा नहीं, बल्कि मेरे सपनों और आत्मविश्वास की भी यात्रा बनती जा रही थी।
दो दिन की लंबी यात्रा के बाद अंततः मैं केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा पहुँची। वहाँ पहुँचकर मुझे ऐसा लगा मानो मैं एक बिल्कुल नई दुनिया में आ गई हूँ। नया शहर, नया वातावरण, नए लोग और नई भाषा की शुरुआत में सब कुछ अपरिचित लग रहा था। लेकिन धीरे-धीरे मैं उस वातावरण में घुलने-मिलने लगी। संस्थान का वातावरण अत्यंत शिक्षाप्रद और प्रेरणादायक था। वहाँ के शिक्षक सहयोगी थे और सहपाठियों का व्यवहार भी बहुत अच्छा था।
वह संस्थान कई राज्यों तथा देशों की शिक्षक प्रशिक्षु की हिन्दी शिक्षा देने का कार्य करता है जिसके कारण वहाँ रहते-रहते मेरी हिंदी भाषा में भी बहुत सुधार आया। पहले मैं अपनी बात उतने आत्मविश्वास से नहीं कह पाती थी, लेकिन संस्थान ने मुझे बोलने, समझने और अपने विचारों को व्यक्त करने का नया आत्मविश्वास दिया। अब मुझे हिंदी बोलने में पहले की तुलना में अधिक सहजता महसूस होने लगी। यह परिवर्तन मेरे लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं था।
आगरा में बिताया गया समय केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं था। वहाँ मुझे कई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्याित्मक स्थलों को देखने का अवसर भी मिला। जैसे मैंने ताजमहल को बहुत करीब से देखा। उसकी अद्भुत सुंदरता ने मेरे मन को मोह लिया। सफेद संगमरमर से बनी उस भव्य इमारत को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो चाँद धरती पर उतर आया हो। यमुना नदी के किनारे स्थित ताजमहल की शांत और सुंदरता ने मेरे मन को गहराई से प्रभावित किया।
इसके अतिरिक्त मैंने इंडिया गेट और राष्ट्रपति भवन को भी देखा। इंडिया गेट पर शहीदों की स्मृति और राष्ट्रपति भवन की भव्यता को देखकर मेरे मन में देश के प्रति सम्मान और गर्व की भावना उत्पन्न हुई। उन स्थानों की सुंदरता और विशालता को मैंने बहुत करीब से महसूस किया।
मेरी यह यात्रा केवल शैक्षिक यात्रा नहीं रही, बल्कि यह एक आध्याित्मक यात्रा भी बन गई। मुझे वृंदावन, मथुरा और गोकुल जाने का सौभाग्य मिला। वहाँ का भक्तिमय वातावरण आज भी मेरी स्मृतियों में बसा हुआ है। मैंने श्रीकृष्ण जन्मभूमि के दर्शन किए। मंदिरों की घंटियाँ, भजन, आरती और भक्तों की भीड़ ने वातावरण को पूरी तरह आध्याित्मक बना दया था। उस पवित्र भूमि पर पहुँचकर मेरे मन में एक अद्भुत शांति और श्रद्धा की भावना उत्पन्न हुई। ऐसा लग रहा था मानो मैं भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़े किसी दिव्य संसार में पहुँच गई हूँ। आगरा में रहते हुए कई अलग-अलग प्रांत की नई दोस्त बने, जहाँ हम सबने मिलकर पढ़ाई की, घूमे, बातें कीं और अनेक सुंदर यादें बनाई। धीरे-धीरे वे सहेलियाँ मेरे परिवार जैसी बन गईं। समय कैसे बीत गया, इसका पता ही नहीं चला।
कुछ समय बाद छुट्टियों में घर लौटने का अवसर आया। इस बार मैं अकेली नहीं थी, बल्कि मेरी चार सहेलियाँ भी मेरे साथ थीं। हम कुल पाँच लड़कियाँ एक साथ यात्रा कर रही थीं। ट्रेन का वह सफर हँसी, खुशी, मजाक और यादों से भरा हुआ था। हम सब अपने-अपने अनुभव साझा कर रहे थे और रास्ते भर बातें करते रहे। वह यात्रा मेरे लिए अत्यंत आनंदमयी और यादगार बन गई।
अंततः दो दिन की लंबी यात्रा के बाद जब हमारी ट्रेन कामाख्या जंक्शन पहुँची, तब मुझे लेने मेरी दीदी, उनकी सहेली और मेरी बहन आई थीं। इतने दिनों बाद अपने प्रियजनों को सामने देखकर मेरे मन में आत्मीयता और अपनत्व का भाव उमड़ पड़ा। यात्रा की सारी थकान मानो उनके स्नेहपूर्ण स्वागत के बीच क्षणभर में ही विलीन हो गई।
घर पहुँचने पर मेरी दादी मुझे देखते ही भावुक हो उठीं और तुरंत मुझे अपने गले से लगा लिया। उनकी आँखों से स्नेहाश्रु बहने लगे। इतने दिनों बाद मुझे अपने सामने पाकर उनका मेरे प्रति वात्सल्य प्रेम उमड़ पड़ा था। उन्हें इस प्रकार प्रेम और ममता से भरा देखकर मेरी आँखें भी नम हो गईं। उस क्षण घर का वातावरण आत्मीयता, स्नेह और परिवारिक ममता की गहरी अनुभूति से सराबोर हो उठा।
यह यात्रा मेरे जीवन की सबसे सुंदर और अनमोल यात्राओं में से एक है। इस यात्रा ने मुझे आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास, मित्रता, संस्कृति, आध्याित्मकता और जीवन में आगे बढ़ने का साहस सिखाया। केंद्रीय हिंदी संस्थान में बताए गए वे दिन, वहाँ की शिक्षा, मित्रता, अनुभव और यादें मेरे हृदय में सदैव जीवत रहेंगी। यह यात्रा मेरे जीवन की ऐसी अमूल्य धरोहर हैं…..

सुनीता चौहान
असम