कबीर का चिंतन और चेतना
संत कबीर भक्तिकाल के महान कवि, समाज-सुधारक, दार्शनिक और निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। उनका जन्म 1398 ई. में काशी में हुआ।
जिस युग में जाति, धर्म और अंधविश्वास का बोलबाला था, कबीर ने उसके विरुद्ध विद्रोह का स्वर उठाया। उन्होंने बाहरी आडंबरों को नकार कर सत्य, प्रेम और मानवता का संदेश दिया। वे सर्वाेच्च, निराकार ईश्वर में विश्वास रखते थे।
कबीर ने विधिवत शिक्षा ग्रहण नहीं की थी। इस बात को उन्होंने स्वयं स्पष्ट किया-
मसि कागद छुयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।
चारिक जुग को महातम, मुखहिं जनाई बात।
उनके काव्य का आधार अनुभूत यथार्थ था, पोथी-ज्ञान नहीं-
‘‘मैं कहता हूँ आखिन देखी, तू कहता कागद की लेखी।’’
कबीर का ज्ञान अपरिमित था। पंडित हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने उन्हें ‘मस्तमौला भक्त और कवि’ कहा। वे स्वयं में ज्ञान और शिक्षा की पाठशाला थे, अध्यात्म और जीवन के दार्शनिक गुरु।
कबीर ने लोकभाषा को अपनाया। उन्होंने सधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी शैली का प्रयोग किया, जिसमें अवधी, ब्रज, खड़ी बोली और फ़ारसी-अरबी के शब्द सहज रूप से घुले-मिले हैं और उनकी वाणी श्बीजकश् में संकलित है, जिसके तीन प्रमुख भाग हैं -साखी, सबद और रमैनी। कबीर का जीवन-दर्शन उनके दोहों में झलकता है। उन्होंने मृत्यु को जीवन का शाश्वत सत्य माना।
‘‘पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात।’’
धन-संपत्ति, बड़े महल, सौंदर्य, सब यहीं रह जाता है। जीवन पानी के बुलबुले-सा नश्वर और अनिश्चित है।
उन्होंने मूर्तिपूजा और बाहरी कर्मकांड का कड़ा विरोध किया, ‘‘पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजूँ पहार।’’
‘‘ताते तो चाकी भली, पीस खाय संसार।’’ ‘‘मूड़ मुड़ाए हरि मिले, तो सब कोई लेइ मुड़ाय, बार-बार के मूड़ते, भेड़ न बैकुंठ जाय।’’ धार्मिक कट्टरता पर प्रहार, ईश्वर का मर्म जाने बिना लोग आपस में लड़ते हैं।
‘‘हिंदू कहे मोहि राम पियारा, तुरक कहे रहमाना।
आपस में दोउ लरि-लरि मुए, मरम न कोऊ जाना।’’
कबीर ने प्रेम की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रेम सूक्ष्म और विराट है। जो ढाई आखर ‘प्रेम’ को समझ गया, वही सच्चा ज्ञानी है।‘‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।’’
‘‘ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।’’ ‘‘जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।’’
‘‘प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाहिं।’’
नाम-जप इतना प्रभावशाली है कि ‘मैं’ का अहंकार मिट जाता है और सर्वत्र ईश्वर ही दिखाई देता है।
अंतर्मुखी साधना, कबीर, ईश्वर को बाहर ढूँढने को नहीं कहते। वे कहते हैं, ‘‘मन ही राम है, मन ही रामहिं जाप। रामहिं मन में देखि ले, मिटि जाहिं सब ताप।’’
‘‘कबीर हरि के नाम बिन, झूठे सकल जंजाल।’’
‘‘आदि-अंत सब सोधिया, दूजा सिरजनहार।’’ ईश्वर हमारी आँखों की पुतली-सा हमारे भीतर ही विराजमान है। कबीर सामाजिक समरसता के संदेश में कहते हैं प्राणी-मात्र से भेदभाव भूलकर समता, सौहार्द और प्रेमभाव से रहना चाहिए। ‘‘कबीरा या संसार में, भाँति-भाँति के लोग। सबसों हिलमिल चालिए, नदी नाव संजोग।’’ ‘‘कागा काको धन हरै, कोयल काको देय। मीठे बचन सुनाय के, जग अपनो कर लेय। कुटिल बचन सबतें बुरा, जारै सबहीं गात।’’
‘‘साधु बचन जल रूप है, बरसै अमृत पात।’’
कर्म और साधु-लक्षण पर, कबीर की साखियाँ ज्ञान का भंडार हैं। वे कहते हैं, परिश्रम बिना लक्ष्य नहीं मिलता –
‘‘हौ बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ।’’
सच्चा साधु वही है जो सार को ग्रहण करता है, थोथे को उड़ा देता है। ‘‘सारि सारि को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय। संत न छाँड़ै संतई, जो कोटिक मिलैं असंत। चंदन भुवंगम बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।’’
कबीर कहते हैं -मूर्खों के आगे ज्ञान की नुमाइश व्यर्थ है। न तो बात-बेबात शेखी बघारो, न ही गलत पर चुप रहो। यही संतुलन सफलता की कुंजी है।
स्वयं को अज्ञानी बताने वाले कबीर वास्तव में महाज्ञानी थे। कभी वे ख़ुद को ‘राम की बहुरिया’ कहते कभी ‘राम के बालक’। उनकी मौलिकता और प्रतिभा अनुपम थी।
कबीर की शैली भावना की अनुभूति से युक्त, और रहस्यवादी रही वे पथभ्रष्ट समाज को मर्यादा और उचित मार्ग पर लाना चाहते थे। साधक, भक्त, ज्ञानी और उपदेशक के रूप में वे प्राणी-मात्र के अत्यंत निकट रहे। उन्होंने रचनाओं में सहजता को प्रमुख स्थान दिया, जो कला की सबसे बड़ी विशेषता है। उनकी शैली दो प्रकार की है, रचनात्मक पक्ष में हरि-स्मरण, विश्वास, धैर्य, दया, विचार, औदार्य, क्षमा, संतोष आदि। दूसरी आलोचनात्मक पक्ष, कुसंग, माया, मन की चंचलता पर चेतावनी।
निस्संदेह, समकालीन कवियों में भक्ति-भाव और प्रेम-रस में सभी अद्वितीय थे, परंतु खरा कहने वाला, ज्ञान का दीप जलाने वाला, यथार्थ के मार्ग पर ले जाने वाला कबीर-सा दूसरा कोई नहीं हुआ। उनके संदेश आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और पथ-प्रदर्शक रहेंगे।

सुनीता मिश्रा
भोपाल