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हीट वेव का प्रहार: पारा जा सकता है 50 पार

आजकल हीट वेव ने मनुष्यों, जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों को बेहाल कर रखा है। देश के सभी क्षेत्रों में अधिकतम तापमान सामान्य औसत तापमान से अधिक है। आजकल लगभग सभी मैदानी क्षेत्रों में अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक पहुँच गया है। दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में आसमान से आग बरस रही है। बांदा और श्रीगंगानगर में तो पारा 48 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है। एक्यूआई ने हाल ही में दुनिया के 50 सबसे गर्म शहरों की जो सूची जारी की है उसमें सभी शहर भारत के हैं। ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि इस बार पारा 50 डिग्री सेल्सियस के पार जा सकता है। कुछ मौसम वैज्ञानिकों ने कहा है कि सुपर अल नीनो विकसित होने की संभावना है जिसके प्रभाव से भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून कमज़ोर होने और उत्तर-पश्चिम एवं मध्य भारत में भयंकर गर्मी एवं सूखे की स्थिति होने की आशंका है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने हीट वेव से बचने की सलाह दी है। मौसम वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि इस बार गर्मी विगत 150 वर्षों का कीर्तिमान तोड़ सकती है लेकिन पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने से आँधी और हल्की बारिश होने की संभावना है जिससे तापमान में राहत मिलने की उम्मीद है। 

हीट वेव क्या है?

हीट वेव की स्थिति तब होती है जब लगातार 5 दिनों से अधिक दिनों तक दैनिक अधिकतम तापमान औसत अधिकतम तापमान से 5 डिग्री सेल्सियस अधिकार हो जाता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने मैदानी क्षेत्रों, तटीय क्षेत्रों तथा पहाड़ी क्षेत्रों में अधिकतम तापमान क्रमशः 40 डिग्री, 37 डिग्री तथा 30 डिग्री सेल्सियस को हीट वेव के मानक के रूप में निर्धारित किया है। यदि यह विचलन 6.4 डिग्री सेल्सियस से अधिक है तो गंभीर हीट वेव की स्थिति होती है। यह गर्म हवाओं और उच्च तापमान की वह स्थिति होती है जो मानव स्वास्थ्य के लिए घातक होती है।

हीट वेव के प्रभाव

1. हीट वेव का मानव स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है। शरीर में पानी की कमी हो जाती है तथा शरीर का तापमान बढ़ जाता है। इससे तेज बुखार, उल्टी, दस्त, चक्कर आना, कमज़ोरी, गला सूखना, त्वचा का शुष्क या लाल होना, बेहोशी, दमा, माँसपेशियों में ऐंठन, दिल की धड़कन व सांसों का तेज़ चलना, रक्तचाप असामान्य होना, गुर्दे में परेशानी, पेट में संक्रमण आदि बीमारियां उत्पन्न हो सकती हैं। हीट वेव महिलाओं के प्रजनन तथा मातृ-स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। यदि समुचित इलाज नहीं किया जाए तो मरीज की मौत हो सकती है। 

2. गर्म हवाओं के थपेड़े सहन न कर पाने के कारण जीव-जंतुओं की मौत हो सकती है। 

3. फसलों के समय से पहले पक जाने के कारण पैदावार में कमी हो सकती है। खेतों में आग लगने की घटनाएं हो सकती हैं जो कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। इससे उपलब्ध सिंचाई जल की मात्रा में भी कमी हो सकती है। 

4. हीटवेव कूलिंग उद्देश्यों के लिये बिजली की माँग को बढ़ा सकती है, जिससे पावर ग्रिड पर दबाव पड़ सकता है और संभावित ब्लैकआउट की स्थिति हो सकती है। यह आर्थिक गतिविधियों को बाधित कर सकता है, उत्पादकता और उन कमज़ोर आबादी को प्रभावित कर सकता है, जिनके पास हीटवेव के दौरान बिजली तक पहुँच नहीं हो।

5. हीट वेव कृषि के लिये एक बड़ी समस्या है, जो फसलों तथा पशुधन दोनों पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। भीषण गर्मी के चलते किसानों की कार्यदक्षता में गिरावट आती है तथा मौसमी बेरोजगारी में वृद्धि होती है। भीषण गर्मी श्रमिकों की उत्पादकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। 

6. हीट वेव पशुओं के विभिन्न शारीरिक कार्यों और व्यवहारों को बाधित कर सकता है, जिसकी गंभीरता पशु की नस्ल तथा पर्यावरण पर निर्भर करती है।

7. पेड़-पौधे बादलों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं जिससे बारिश होती है। गंभीर हीट वेव के कारण पेड़-पौधे जल जाने से पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 

8. वनों की कटाई तथा सूखे की स्थिति बिगड़ने से जल की उपलब्धता में कमी आती है। इससे खाद्यान्न की आपूर्ति प्रभावित होती है। 

हीट वेव के कारण

हीट वेव के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं—

1. गर्म और शुष्क वायु का एक बड़ा क्षेत्र गर्मी के रूप में कार्य करता है। फिर प्रचलित वायु इस गर्म वायु को अन्य क्षेत्रों में ले जाती हैं, जिससे तापमान में वृद्धि होती है।

2. वायु में नमी गर्मी को रोककर रखती है और उसे बाहर निकलने से रोकती है, जबकि शुष्क वायु सौर विकिरण को अधिक आसानी से सतह तक पहुँचने देती है तथा रात में न्यूनतम अवरोध के साथ वापस भेज देती है, जिसके परिणामस्वरूप दिन के तापमान में तेज़ी से वृद्धि होती है।

3. बादल एक ढाल की तरह काम करते हैं, जो सूर्य की रोशनी को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित करते हैं और पृथ्वी की सतह को गर्म होने से रोकते हैं। साफ, बादल रहित आकाश अधिकतम सौर विकिरण को ज़मीन तक पहुँचने देता है, जिससे गर्मी बढ़ती है।

4. वायुमंडल की उच्च दबाव प्रणाली के कारण हवा नीचे बैठती है और गर्म होती है। इससे आसमान साफ रहता है और सौर विकिरण सीधे सतह पर पड़ता है। 

5. प्रतिचक्रवात बड़े पैमाने पर वायुमंडलीय परिसंचरण प्रतिरूप हैं, जिनमें वायु का अवतलन शामिल है। यह अवतलित वायु रुद्धोष्म रूप से संपीड़ित होकर गर्म हो जाती है (बिना ऊष्मा प्राप्त किये गर्म हो जाती है), जिससे सतह पर तापमान बढ़ जाता है।

6. उत्तर-पश्चिमी भारत जैसे शुष्क या अर्ध-शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में गर्मी की लहरें अधिक बार आती हैं। गर्मियों के महीनों के दौरान प्रचलित पश्चिमी वायुएँ गर्मी की लहरों को पूर्व और दक्षिण की ओर प्रवाहित होती हैं।

7. ग्लोबल वार्मिंग के कारण गर्मी की लहरों की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है। बढ़ता आधारभूत तापमान इन घटनाओं के घटित होने के लिये अधिक अनुकूल वातावरण तैयार करता है।

8. जीवाश्म ईंधन (कोयला, गैस, पेट्रोल, डीजल) के अत्यधिक उपयोग से ग्रीनहाउस गैसों (कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रस अॅक्साइड, मीथेन आदि) का उत्सर्जन होता है जो गर्मी को वायु मंडल में फंसा लेती हैं। 

9. सीमेंट, स्टील आदि उद्योगों से निकलने वाले धुएँ से वातावरण में कार्बन डाइअॅक्साइड बढ़ रही है जिससे पारिस्थितिकी तंत्र बाधित हो रहा है। 

10. कंक्रीट संरचनाएँ, कम हरियाली और प्रदूषकों की उपस्थिति से शहरी क्षेत्रों में गर्मी अधिक रहती है। 

निम्नलिखित उपायों द्वारा हीट वेव से होने वाले बुरे प्रभावों से बचा जा सकता है–

1. पर्याप्त पानी पीएं। 

2. ठंडे पानी से स्नान करें। 

3. सूती एवं ढीले वस्त्र पहनें। 

4. घर की खिड़की और दरवाजों को बंद करके परदों से ढककर रखें। 

5. ठंडे वातावरण में रहें। 

6. खरबूजा, तरबूज़, खीरा, ककड़ी तथा अन्य ताजे फल खाएं। 

7. नींबू-नमक-शक्कर का घोल, नींबू-पुदीना पानी, नारियल पानी, बेल गिरि शर्बत, लस्सी, छाछ, आम पन्ना पीएं। 

8. हल्का भोजन करें तथा तले एवं मसालेदार भोजन से बचें। 

9. शराब, चाय, कॉफी और कार्बाेनेटेड शीतल पेय से बचें, जो शरीर से पानी को कम करते हैं।

10. दोपहर 12 बजे से 4 बजे तक घर से बाहर निकलने से बचें। 

11. सीधी धूप के संपर्क में आने से बचें। यदि धूप में जाना आवश्यक हो तो सिर पर टोपी लगाकर या गमछा लपेटकर, आँखों में धूप का चश्मा लगाकर और भरपूर पानी पीकर निकलें।

12. अपने घर की छत, छज्जे, आँगन या आसपास किसी छायादार स्थान पर मिट्टी के बर्तन में स्वच्छ पानी रखें ताकि पशु-पक्षी पानी पी सकें। 

हीट वेव की तीव्रता और बढी़ हुई आवृत्ति ने लोगों के स्वास्थ्य और आजीविका को झकझोर दिया है। भारत में हीट वेव के प्रभावों को कम करने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। इसके लिए सरकार, समाज और वैज्ञानिक समुदाय को मिलकर दीर्घकालिक समाधान विकसित करने होंगे। जलवायु अनुकूलन, स्मार्ट शहरी योजना, कृषि नवाचार और वैश्विक सहयोग से ही इस चुनौती से निपटा जा सकता है। इसके लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, हीट एक्शन प्लान और लचीले बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता है। शहरी हरियाली, परावर्तक छतें और टिकाऊ जल प्रबंधन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। 

शीतलन-केंद्रित शहरी नीतियों को लागू करना सार्वजनिक स्वास्थ्य में सहायक सिद्ध होगा।

हमें परंपरागत जल संरक्षण तकनीकों और आधुनिक विज्ञान व तकनीक के समन्वय की भी आवश्यकता है। स्थानीय समुदायों को अपने पारंपरिक ज्ञान और नए तकनीकी उपायों को अपनाकर भू-जल स्तर बढ़ा सकते हैं तथा जल का बेहतर उपयोग कर सकते हैं। 

छोटे-छोटे तालाबों (जोहड़) के निर्माण से जल संचयन किया जा सकता है। छोटे जलाशय वर्षा जल को संग्रहीत कर भूजल पुनर्भरण में मदद करते हैं। बारिश के पानी को इकट्ठा करके खेती के लिए उपयोग किया जा सकता है। शहरों में अपशिष्ट जल को पुनः उपयोग में लाने की प्रणाली विकसित की जानी चाहिए। जलवायु परिवर्तन और अनियमित बारिश जल संकट को बढ़ा सकते हैं। ऐसे में परंपरागत जल संरक्षण प्रणालियाँ मददगार साबित हो सकती हैं। अधिक गर्मी सहने वाली और कम पानी में पनपने वाली फसलें विकसित की जानी चाहिए। हरी छतें, जलाशयों और खुले हरे क्षेत्रों को बढ़ावा देना चाहिए। हीट-रेसिस्टेंट निर्माण सामग्री, वाटर स्प्रे सिस्टम, माइक्रो-इरिगेशन तकनीक (टपक सिंचाई) अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

विनय वंसल

आगरा (उत्तर प्रदेश)

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