गन्दा गलियारा राजनीति का
गलियारे गन्दे होते हैं तो सफाई की जाती है, ज्यादा बदबूदार हो गए हांे तो चुना डालकर, फिनायल से सफाई की जाती है। गलियारा साफ हो जाता है। किन्तु राजनीतिक गलियारों को साफ़ करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। कोई भी दल या पार्टी किसी का भला नही करती, हाँ मगर खुद की सेवा जरूर करते हैं। जनता मरे या जिए, कोई फर्क नहीं पड़ता। जनता का भला कोई नहीं करता। सबको अपनी पार्टी को आगे बढ़ाने का मौका चाहिए। जनता के कन्धे पर बंदूक रख के दागी जाती है। जनता की सेवा एक पहेली बनके रह जाती है, कोई इस पहेली को नही सुलझाता। यही वर्तमान की सच्चाई है। कांग्रेस, बसपा, आम आदमी, ए ई एम ई एम, सपा, भाजपा, उच्च पार्टी हो या निम्न सबका वही हाल है।
वर्तमान में भारत की ये परस्थिति बन चुकी है कि जनता किसको अपना हितैषी समझे? कौन सी पार्टी को। किसको अपना लीडर चुने। कांग्रेस की स्थापना से लेकर आज़ादी तक ठीक ठाक काम दिखा। फिर वह भी स्वार्थी हो गई। यदि स्वार्थ न होता तो 1947 मे कुर्सी जिन्ना को दे देते नेहरू जी, भले ही कुछ सालों के लिए, शायद तब बटवारा नही होता। बिन मौत लोग न मारे जाते। मरने वाला कोई भी धर्म का हो उससे पहले वह हिंदुस्तानी था। उसका खून बहना जायज नही था। जितने भी दंगे हुए है अभी तक- 1947, 1984, 2002 कोई भी दंगा हो; क्या उस दंगे मे कोई लीडर या पार्टी का सदस्य मिला?
आजादी (1947) के बाद भारत में राजनीतिक और सांप्रदायिक दंगों का लंबा इतिहास रहा, जो अक्सर सत्ता संघर्ष, ध्रुवीकरण या वैचारिक मतभेदों के कारण भड़के। प्रमुख घटनाओं में बंटवारे की हिंसा, 1984 सिख विरोधी दंगे, 1992 बाबरी मस्जिद विध्वंस और 2002 गुजरात दंगे शामिल हैं। इन दंगों ने देश के सामाजिक-राजनीतिक ढाँचे को गहरा प्रभावित किया। जबलपुर दंगा (1961): स्वतंत्रता के बाद शुरुआती सांप्रदायिक दंगों में से एक। गुजरात दंगा (1969): बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा। भागलपुर दंगा (1989): बिहार में भीषण सांप्रदायिक हिंसा। कश्मीर हिंसा (1989): राजनीतिक और सांप्रदायिक तनाव के कारण विस्थापन। प्रत्येक दंगे में नुकसान किसका हुआ? मतलब, नुकसान हर हाल में जनता का ही हुआ। तब घर से बेघर जनता हुई। न जाने कितनी माँएँ बच्चों से बिछड़ गईं। न जाने कितने बच्चे घर से बेघर हो गए। उसके बाद कितने दिन लग गए सुधारने में। भूखे मरने की नौबत आ गई। न कपड़े, न घर होने के बाद पार्टी का क्या नुकसान हुआ? कुछ नहीं? सब पर नजर डालने के बाद मालूम ये हुआ, कि कोई पार्टी वर्तमान में जनता के हित मे नही है। कोई धर्म पर राजनीति करता है, कोई अपने पूर्वजों के कार्य गिनाता है, कोई झाड़ू दिखाता है, कोई निम्न वर्ग को लेकर, कोई मध्यम वर्ग को लेकर, कोई सम्पूर्ण जनता के हित मे नही बात करता, आख़िर क्यों?
क्या एक ही दल का भला करना है। जनता आज कल मूर्ख बनी हुई है। कोई भी मज़बूत दल क्यों नहीं सभी के लिए तैयार होता। जनता से मोहब्बत हो क्योंकि जब कोई दल जीतता है तो उसकी निगाह सिर्फ दौलत पर होती है। वह दौलत इकठ्ठा करके विदेश का सफ़र तय करते हैं। यहाँ बचता है सिर्फ गरीबी, भूखमरी, बेरोजगारी, दंगे, मोबलिचिंग, धर्म के नाम पर दंगे-फसाद, टुटी सड़कें, दुर्व्यस्थित नगर- ग्रामिण क्षेत्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार, गन्दी नदिया, सूखे जंगल और बिन आशियाने के परिदें। प्रदूषण की वजह से अश्वत्थामा मर्ज बढ़ रहा है। इस सब पर चर्चा नही होती है?
या फिर विकास के नाम पर दंगे, मन्दिर, मस्जिद, शूद्र, वैश्य, नमाज, यही बचा है, ‘‘बेटी बचाओ और सड़क पर नचाओ’’।
बेटियों के लिए क्या योजना निकाली?
कौन सा बेटियों सुरक्षित है। जब कांग्रेस की सरकार थी, तब भी रेप होते थे, और आज भी रेप हो रहे हैं। क्या बदलाव आया? कुछ नया नही हो रहा है। अतः कोई भी राजनीतिक दल जनता के हित में नहीं है ये बात सत प्रतिशत सत्य है। जनता अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए शिक्षित हो खुद के अधिकारों की माँग करे। कोई एक दल ऐसा तैयार करें जो दौलत नही जनता के हित मे काम करे उस दल को आगे बढ़ाओ। ‘‘वर्तमान परिस्थिति के अनुसार कोई भी राजनीतिक दल के गलियारे साफ सुथरे नही हैं, सब गंदे कीचड़ से भरे हैं जरा सी मुसीबत आते ही दल छोड़ देते हैं।’’ इसलिए स्वयं की सुरक्षा खुद करें। वर्तमान परिस्थिति अत्यन्त नाजुक है। परिस्थिति के अनुसार कोई ऐसा दल तैयार किया जाए जो धर्म, जाति, समाज और दौलत से हट करके देखे।
राजनीतिक दल
सब चुनाव से पहले वादे और चुनाव के बाद बदलते इरादे
वर्षा ऋतु मे जब बारिश होती है, तो गाँव के गलियारे गन्दे दिखाई देते हैं। बरसाती मेढक निकल आते हैं। उसी तरह जब चुनाव का मौसम आता है, तो राजनीतिक गलियारे गन्दे हो जाते हैं और नेता-मंत्री बरसाती मेढक की तरह टर्र-टर्र करते हैं। मेढक तो एक साल के लिए छुपते है। ये बेशर्म पूरे के पूरे 5 वर्ष के लिए छुप जाते हैं। कोई भी दल वर्तमान में जनता का हितेषी नहीं है। यह सोचना होगा वरना बहुत बुरा असर पड़ने वाला है।

इफ्फत खातून
लखनऊ यूनिवर्सिटी