कहानी व लेखलघु कथा

तृप्ति

किचन में कामवाली बाई शीला से मुझे गोल चमचमाती काया मिली। मुझे अपनी ऊष्ण देह बड़ी अच्छी लगी। मेरी धन्यवाद की दृष्टि शीला पर थी। मिनटों तक मैं एक गोल टिफिननुमा डिब्बे पर आराम फरमाती रही। हाँ भाई… मैं रोटी ही हूँ।

 फिर राजीव भार्गव जी के लंच टेबल पर मुझे रखी गयी। मेरे और अन्य साथी भी थे। चार-पाँच लोग एक वृत्ताकार टेबल पर आर्मचेयर लगाये बैठे थे। सभी सुरुचिपूर्वक भोजन करने लगे। तभी मिसेज भार्गव ने मुझे दाल से भिगोकर; एक निवाला लिया, और ‘‘रोटी को खाने का मन नहीं है’’, कहते हुए एक अलग से प्लेट पर रख दिया। फिर उनके इशारे पर शीला ने मुझे प्लेट सहित कुत्ते के सामने रख दी। कुत्ते ने मुझे तनिक सूँघा। उसका भी पेट भर गया था; पास में दूध के सकोरे और बिस्किट के कुछ रैपर्स जो पड़े थे। उसने भी मुझसे मुँह फेर लिया।

कुछेक क्षण पश्चात शीला ने मुझे खिड़की से बाहर फेंक दिया। मैं दाल-सब्जी से सनी हुई थी; नाली में जा गिरी। गंदे पानी से मैं भीग गयी। तभी मुझ पर एक भिखारी की नजर पड़ी। वह लगभग साठ-पैंसठ बरस का रहा होगा। बेचारा दौड़कर आया। मुझे उठाया। पास के ही नल के पानी से मुझे धोया। मुझे वह खाने में बड़ी शीघ्रता करने लगा। पल भर में मैं उसके उदर में समा गयी। राह चलते उसने डकार ली; पर तृप्ति मुझे मिली। और हाँ, शीला को मैंने धन्यवाद देना नहीं छोड़ा।

टीकेश्वर सिन्हा ‘गब्दीवाला’

घोटिया-बालोद (छत्तीसगढ़)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *