माँ: वह अनमोल दौलत, जिसके आगे दुनिया की हर संपत्ति फीकी है
आज का युग भौतिक सुख-सुविधाओं, धन, पद और प्रतिष्ठा की अंधी दौड़ का युग बनता जा रहा है। इंसान दिन-रात सफलता और वैभव पाने की कोशिश में इतना व्यस्त हो गया है कि वह जीवन की सबसे अमूल्य पूंजी को धीरे-धीरे भूलता जा रहा है। वह अनमोल पूंजी है- माँ।
सच तो यह है कि जिसके जीवन में माँ का आशीर्वाद और स्नेह मौजूद है, वह व्यक्ति संसार का सबसे समृद्ध इंसान है, चाहे उसके पास करोड़ों की दौलत हो या न हो।
माँ केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, करुणा, ममता और समर्पण का जीवंत स्वरूप है। वह ईश्वर का वह अनुपम उपहार है, जो अपने बच्चों के हर दुख को स्वयं सहकर भी उनके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहती है। बच्चा जब बोलना भी नहीं जानता, तब माँ उसकी आंखों की भाषा पढ़ लेती है। उसकी गोद बच्चे की पहली पाठशाला होती है और उसकी लोरी जीवन का पहला मधुर संगीत।
माँ का त्याग इतना विशाल होता है कि उसकी तुलना संसार की किसी भी संपत्ति से नहीं की जा सकती। वह स्वयं अधूरी रहकर अपने बच्चों के सपनों को पूरा करती है। कई बार माँ अपनी इच्छाओं, खुशियों और जरूरतों का त्याग केवल इसलिए कर देती है ताकि उसके बच्चों को किसी अभाव का सामना न करना पड़े। वह रात-रात भर जागकर बच्चों की बीमारी में सेवा करती है, उनकी सफलता के लिए प्रार्थनाएँ करती है और हर कठिन परिस्थिति में ढाल बनकर खड़ी रहती है। माँ का प्रेम कभी शर्तों में बंधा नहीं होता; वह केवल देना जानती है, बदले में कुछ माँगना नहीं।
आज आधुनिकता और तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक तो बना दिया है, लेकिन दुर्भाग्य से रिश्तों की गर्माहट कम होती जा रही है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, संवेदनाएँ कमजोर पड़ रही हैं और अनेक बुजुर्ग माताएँ अकेलेपन का दर्द झेल रही हैं। कुछ लोग अपने माता-पिता को वृद्धाश्रमों में छोड़कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाना चाहते हैं। यह केवल एक माँ का नहीं, बल्कि पूरी मानवता और संस्कृति का अपमान है। जिस माँ ने उंगली पकड़कर हमें चलना सिखाया, वही माँ आज अपने बच्चों के दो मीठे शब्दों और थोड़े से समय के लिए तरसती दिखाई देती है। यह स्थिति समाज के लिए अत्यंत चिंताजनक है।
इतिहास गवाह है कि दुनिया के अनेक महान व्यक्तियों ने अपनी सफलता का श्रेय अपनी माँ को दिया है। माँ ही वह पहली गुरु होती है, जो बच्चे को संस्कार, अनुशासन, दया, सहनशीलता और मानवता का पाठ पढ़ाती है। किसी भी महान राष्ट्र और सभ्य समाज की नींव माँ की गोद में ही रखी जाती है। यदि माँ संस्कारवान है, तो आने वाली पीढ़ियां भी मजबूत और नैतिक बनती हैं।
भारतीय संस्कृति में माँ को सदैव सर्वाेच्च स्थान दिया गया है। हमारे वेदों और शास्त्रों में कहा गया है-
‘‘मातृ देवो भवः’’
अर्थात् माँ को देवता के समान सम्मान दो।
वास्तव में माँ के चरणों में ही स्वर्ग बसता है। जिस घर में माँ का सम्मान होता है, वहाँ सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा स्वतः निवास करती है। माँ केवल परिवार की धुरी नहीं होती, बल्कि पूरे घर की आत्मा होती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी व्यस्त जिंदगी से थोड़ा समय निकालकर माँ के प्रति अपने प्रेम, सम्मान और कृतज्ञता को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी व्यक्त करें। केवल ‘‘मदर्स डे’’ पर शुभकामनाएँ देना पर्याप्त नहीं, बल्कि हर दिन माँ के त्याग और संघर्ष को समझना और उनका सम्मान करना आवश्यक है। उनके साथ बिताया गया हर पल जीवन की सबसे सुंदर स्मृति बन जाता है।
सच तो यह है कि संसार की हर दौलत एक दिन समाप्त हो सकती है, लेकिन माँ का प्रेम कभी समाप्त नहीं होता। माँ वह अनमोल खजाना है, जिसकी कीमत शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। जिसने माँ के महत्व को समझ लिया, उसने जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति प्राप्त कर ली।

सत्य भूषण शर्मा
उदयपुर राजस्थान