मानभट्ट की माननीय गुरु-शिष्य परंपरा
‘आख्यान’ शब्द का अर्थ है – आ + ख्या = कहना, कथन करना।
गीत, संगीत, चित्र, कथा, कहानी, नाट्य और नृत्य जैसे सभी कलात्मक गुणों से युक्त जो प्रस्तुति लोककल्याण के उद्देश्य से लोकप्रिय हुई, वह लोकहृदय पर राज करने लगी। ऐसी ही एक कला, जो आज तक लोगों की प्रिय बनी हुई है, वह है ‘आख्यान कला’।
लोकप्रिय आदि कवि नरसिंह मेहता ने जीवन भर संघर्ष किया, समाज के बहिष्कार को सहा और साहित्य तथा संगीत की सेवा की। कहा जाता है कि व्यवस्थित आख्यान की परंपरा पहली बार उन्हीं से प्राप्त होती है। यद्यपि उनसे पहले भी मौखिक साहित्य विभिन्न रूपों में प्रचलित था, किंतु जब नरसिंह मेहता ने नौ पदों में विस्तृत ‘सुदामा चरित्र’ की रचना की, तब उसमें उनकी काव्यशक्ति का अद्भुत परिपाक दिखाई दिया। आरंभ, मध्य और अंत में नाटकीय मोड़ों ने इस काव्यरूप को ‘आख्यान’ नाम सार्थक रूप से प्रदान किया।
नरसिंह मेहता के बाद मध्यकाल में भी आख्यान रचे जाते रहे, किंतु भेषधारी कवि प्रेमानंद भट्ट ने इस साहित्यिक स्वरूप की प्रतिष्ठा को बनाए रखा। आज की गुजराती भाषा, जिसे कभी ‘मारु गुर्जर’ अथवा ‘पुरानी पश्चिमी राजस्थानी’ कहा जाता था, उसका नामकरण भी उन्हीं के द्वारा किया गया माना जाता है। उनकी वर्णन-कला, शब्द-चित्रों और रस-निष्पत्ति की परंपरा को उनके साहित्यिक उत्तराधिकारियों ने संगीत से समृद्ध किया।
उनके शिष्य लल्लु व्यास ने इस कला को जीवित रखा। वे मिट्टी की ‘माण’ (विशेष घड़ा) का उपयोग करते थे, परंतु उनके प्रशंसकों ने उन्हें तांबे की गागर भेंट की। यह गागर बाद में उनके शिष्य श्री चुनीलाल पंड्या को मिली। मोडासा निवासी चुनीलाल पंड्या ने इस विशिष्ट आख्यान कला को आत्मसात किया और पूरे गुजरात में इसका प्रचार किया। उन्होंने मुंबई जैसे ‘परदेश’ में भी गायन, वादन और कथन की इस कला को लोकप्रिय बनाया। प्रेमानंद के आख्यानों के साथ-साथ उन्होंने अपनी स्वयं की रचनाएं भी प्रस्तुत कीं। ‘संगीत सत्यनारायण कथा’, ‘पुरुषोत्तम माहात्म्य’ और ‘हरिश्चंद्र’ उनकी प्रमुख कृतियां मानी जाती हैं।
0 यह मानभट्ट परंपरा क्या है?
आदरणीय चुनीलाल पंड्या की गोद में समान रूप से दो जीव पले-बढ़े। एक थी बड़ी पेट वाली, संकरे मुख की तांबे की गागर और दूसरा था उनका पुत्र धार्मिकलाल पंड्या। समर्पित कलाकारों के लिए उनके वाद्य भी जीवंत व्यक्तियों के समान होते हैं। दोनों का श्रेष्ठ विकास ही उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य था।
प्रेमानंदी गागर की यात्रा, उसके गुण, उसका अद्भुत साथ और उसकी रसपूर्ण परंपरा का प्रत्यक्ष अनुभव आज कौन सुना सकता है? इसका उत्तर है – श्री धार्मिकलाल पंड्या।
बचपन से ही संगीत के वातावरण में पले धार्मिकलाल पंड्या ने अपने पिता को घर में अभ्यास करते और सभाओं में आख्यान प्रस्तुत करते देखा था। उन्होंने अपने पिता की निष्ठा को आत्मसात किया। किंतु उन्हें यह नहीं पता था कि किशोरावस्था में ही उन्हें इस परंपरा की ज्योति को आगे बढ़ाने का दायित्व संभालना पड़ेगा।
मैट्रिक परीक्षा पूरी होने के बाद उनके पिता केवल तस्वीरों में रह गए। वे अपनी माता शारदा की आंखों के आंसुओं में पिता के वात्सल्यपूर्ण चेहरे का प्रतिबिंब देखते रहे और अंततः पिता की संगीत-साधना के उत्तराधिकारी बन गए। उन्होंने पिता के साथ-साथ प्रेमानंद को भी गुरु माना और उसी मार्ग पर चल पड़े।
सर्वश्रेष्ठ आख्यान कवि माने जाने वाले प्रेमानंद कृष्णराय भट्ट (1649–1714, वडोदरा) के साहित्य का हाथ पकड़कर वे आगे बढ़े और काव्य तथा तालवाद्य ‘माण’ की साधना में डूब गए। मध्यकालीन गुजरात के महान कवि और ‘मानभट्ट’ कहलाने वाले आख्यानकारों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, प्रेमानंद के लगभग तीन शताब्दियों बाद जन्मे (1932) धार्मिकलाल चुनीलाल पंड्या ने इस कला को जीवित रखा और स्वयं एक मानक बन गए। उनकी दसों उंगलियां अंगूठियां पहनकर ‘माण’ पर नृत्य करती प्रतीत होती हैं।
0 पद्मश्री धार्मिकलाल पंड्या के अनुसार ‘माण’
आख्यान कला में ‘माण’ या गागर का महत्व शरीर में हृदय जैसा है। जैसे हृदय धड़कता है, वैसे ही माण भी धड़कता है। नब्बे वर्ष की आयु पार करने के बाद भी चेहरे पर ताजगीभरी मुस्कान लिए धार्मिकलाल पंड्या आख्यान कला की बारीकियों को रसिकों के सामने प्रस्तुत करते रहे। दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत में जिस प्रकार ‘घटम’ का महत्व है, उसी प्रकार माण भी एक महत्वपूर्ण तालवाद्य है। इसका गूंजता हुआ नाद पूरे वातावरण को भर देता है और कलाकार में ऊर्जा का संचार करता है।
आख्यान के विषय के अनुसार चौदह मात्राओं वाले ताल की गति पर माण पर थाप दी जाती है। माण के निचले भाग से कोमल और हल्की ध्वनि निकलती है। थोड़ा ऊपर जाने पर स्पष्ट और मधुर स्वर उत्पन्न होता है। सौंदर्य रस की धारा बहने लगती है।
धीरे-धीरे आख्यान की विषयवस्तु के अनुसार विभिन्न रस प्रकट होते हैं।
ऊपरी किनारे तक पहुंचते-पहुंचते माण का स्वर सौंदर्य रस से परिपूर्ण होकर अलग-अलग रूपों में गूंजता है।
विभिन्न प्रसंगों की तीव्रता और मधुरता के अनुसार कलाकार अलग-अलग तालों का प्रयोग करता है, जो कविता के शब्दों और अर्थों के अनुरूप होते हैं। युद्ध दृश्य में दादरा ताल का उपयोग किया जाता है, जिससे वीर रस की उत्पत्ति होती है। लोकधुनों और नरसिंह मेहता के झूलना छंदों से आगे चलकर खमाज जैसे शास्त्रीय राग भी विकसित हुए।
लसरको
“रस, राग, अलंकार और छंद की प्रकृति के साथ भावक की प्रकृति का मिलन।”
कला के मेले में आनंदित रसिक
कथा, कविता, श्लोक, गीत, संगीत, कीर्तन, भजन और ग़जल की परंपराओं का चिंतन करने वाले भारतीय विद्वानों ने सदैव पुरातन विरासत को आत्मसात करने का प्रयास किया है। समय के साथ इस परंपरा में विविधता आती गई। यह माना जाता है कि रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों से भी पहले जन-मनोरंजन, ज्ञान-प्राप्ति और ज्ञान-प्रसार के अनेक माध्यम विद्यमान थे। भारतीय संस्कृति और उसके संरक्षण में शास्त्रों ने समाज-निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
साहित्य, संगीत और कला के सृजन तथा संरक्षण के लिए हजारों वर्षों से ऋषि-मुनि प्रयासरत रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप उत्कृष्ट साहित्य और सशक्त शास्त्रीय संगीत की परंपरा निरंतर विकसित होती रही। संस्कृत साहित्य के लोकप्रिय होने से पहले भी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में लोकगीत, लोककथाएं और कथावाचन की समृद्ध परंपराएं थीं। लोकभाषाओं में सरल संदेश पहुंचाने का महान कार्य लोककलाकारों, शिल्पियों और रचनाकारों ने किया।
उस समय लिखित परंपरा पूरी तरह विकसित नहीं हुई थी, इसलिए ज्ञान का प्रवाह मुख्यतः मौखिक रूप से होता था। इन कलाओं और शास्त्रों को राजाश्रय भी प्राप्त था।
भक्ति साहित्य, संत साहित्य, जयदेव और नरसिंह मेहता जैसे कवियों ने सांस्कृतिक क्रांति उत्पन्न की। इस प्रकार प्राचीन, मध्यकालीन, आधुनिक और उत्तर-आधुनिक युगों में असंख्य साहित्यिक कृतियां अपने विशिष्ट स्वरूपों के साथ सामने आईं। उन्हीं से अनेक कलाएं स्वतंत्र रूप से विकसित हुईं और आज भी निरंतर पुष्पित-पल्लवित हो रही हैं।

अनिकेत सिंह
लवकुश कोचिंग क्लास,
शाॅप नंबर-12, प्रथम तल,
अभिषेक एलिसियम, एक्सिस बैंक लेन, समा-सालवी रोड, न्यू समा,
बड़ौदा-390008 (गुजरात)