गुरु की महिमा
आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा का दिन गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। आज के दिन ज्ञान देने वाले गुरु की विशेष पूजा की जाती है। वास्तव में देखा जाय तो अज्ञान और अंधकार में भटक रहे लोगों को सही मार्ग पर लाने वाले व्यक्ति को ही गुरु का पद प्रदान किया गया है।
बच्चों को जन्म माता पिता देते हैं लेकिन जीवन का अर्थ और सार समझाने का कार्य गुरु ही करता है। गुरु अपने शिष्य को जीवन की कठिन राह पर मजबूती से खड़े रहने की हिम्मत देता है। हमारी संस्कृति में गुरु को परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है और गुरु के सम्मान में कहा है-
गुरु गोविंद दोनों खड़े, काकै लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपणो,गोविंद दियो बताय।।
इस प्रकार गुरु का महत्व मानव जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानव मन में बुराई रूपी विष को दूर करने में गुरु का विशेष योगदान है। महर्षि वाल्मीकि, जिनका पूरा नाम रत्नाकर था। वे अपने परिवार का भरण पोषण दस्यु कर्म कर करते थे। वे डाकू थे लेकिन आगे चलकर वाल्मीकि ने “रामायण” की रचना की। यह तभी संभव हो पाया जब गुरु रूपी देवर्षि नारद ने उनका हृदय परिवर्तित किया।
पंचतंत्र की कथाएं हमने पढ़ी और सुनी है। नीति कुशल गुरु विष्णु शर्मा ने जिस तरह राजा अमरशक्ति के तीनों अज्ञानी पुत्रों को कहानियों और अन्य माध्यमों से ज्ञानी बना दिया, यह सर्वविदित है।
गुरु और शिष्य का संबंध सेतु के समान होता है। गुरु की कृपा से शिष्य के लक्ष्य का मार्ग आसान हो जाता है।
स्वामी विवेकानंद जी को बचपन से ही परमात्मा की प्रबल चाह थी। उनकी यह मनोकामना तभी पूरी हुई जब उन्हें गुरु रामकृष्ण परमहंस का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। परिणामस्वरूप
विवेकानंद को गुरु की कृपा से ही आत्म साक्षात्कार संभव हो सका।
छत्रपति शिवाजी पर उनके गुरु समर्थ रामदास का प्रभाव सदैव रहा। इतना ही नहीं कबीर का अपने गुरु के प्रति बेहद समर्पण था। उन्होंने अपने गुरु से ज्ञान पाकर जो प्रकाश फैलाया वह आज भी हमारा पथ प्रदर्शन करता है। इसलिए कहा जाता है कि कबीर प्रासंगिक थे, प्रासंगिक हैं और प्रासंगिक रहेंगे। उनके अनेक शिष्य आज उनके पथ पर चल रहे हैं। उनकी निम्नोक्त साखी का उल्लेख करना समीचीन प्रतीत होता है-
सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाड़िया,अनंत दिखावण हार।।
कबीर यहां गुरु की महिमा को अनंत बता रहे हैं क्योंकि गुरु ने ही उनके अज्ञान को दूर कर उन्हें ज्ञान प्रदान किया। साथ ही कबीर ने हमें सचेत भी किया है। कबीर के अनुसार हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे गुरु से सदैव दूर रहना चाहिए जो स्वयं अज्ञानी हो। वे इस संबंध में कहते हैं-
जाका गुरु भी अंधला,चेला खरा निरंध।
अंधे अंधा ठेलिया, दोन्यूं कूप पड़ंत।।
तात्पर्य यह है कि गुरु यदि अज्ञानी है तो वो शिष्य को लेकर अंधे कुंए में जा गिरेगा। अतः जीवन में अज्ञानी गुरु से सदैव दूर रहना चाहिए। इसके अलावा कबीर ने निंदक अर्थात् निंदा करने वाले व्यक्ति को गुरु के समान समझ कर उसकी महत्ता प्रकट की है-
निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।
गुरु पूर्णिमा का दूसरा महत्व यह भी है कि इस दिन महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था। उन्हें पृथ्वी का प्रथम गुरु माना जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन शिष्य अपने गुरुजनों की प्रार्थना करते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं-“गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णुः, गुरुर्देवो महेश्वरा,गुरुर्साक्षात परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवै नमः”
महर्षि वेदव्यास जी न केवल महाभारत के रचयिता हैं वे उन घटनाओं के साक्षी रहे हैं जो क्रमानुसार घटित हुई है। वेदव्यास उन महान् गुरुओं और मुनियों में से एक हैं जिन्होंने अपने साहित्य और लेखन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यथार्थ ज्ञान का भंडार दिया।
कहा जाता है कि शिवपुत्र गणेश जी ने वेदव्यास जी के मुख से निकली वाणी और वैदिक ज्ञान को लिपिबद्ध करने का महनीय कार्य किया था क्योंकि भारतीय संस्कृति में गुरु का बड़ा महत्व है।
महर्षि वेदव्यास जी चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे जिन्होंने हमें वेदों का ज्ञान दिया। परिणामस्वरूप हम सभी उन्हें अपना आदि गुरु मानते हैं। उनके उपदेश और उनके विचार हमारे जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
गुरु के रूप में उनके द्वारा दिए गए उपदेशों में सर्व प्रमुख उपदेश यह है कि हमें अभीष्ट फल की प्राप्ति हो अथवा नहीं, उसके लिए हमें शोक नहीं करना चाहिए। साथ ही किसी के प्रति मन में क्रोध रखने की अपेक्षा उसे तत्काल प्रकट कर देना चाहिए। ठीक उसी प्रकार जैसे पल भर में जलकर राख हो जाना देर तक सुलगने से अच्छा है। उनका यह भी कहना है कि मां का सम्मान करने वाला सदैव सुखी रहता है। वे मानते हैं कि जिस प्रकार तेल समाप्त हो जाने पर दीपक बुझ जाता है वैसे ही कर्म क्षीण होने पर आंतरिक तेज भी नष्ट हो जाता है।
इस प्रकार हमारी संस्कृति में यह सर्वमान्य रूप से स्वीकार किया जाता है कि गुरु का स्थान परमात्मा से भी उच्च है क्योंकि गुरु हमें यदि सद्ज्ञान नहीं देता तो परमात्मा के बारे में हमें कौन बताता?अतः गुरु का स्थान ईश्वर से श्रेष्ठ है।
गुरु पूर्णिमा मनाने की सार्थकता तभी सिद्ध हो सकती है जब हम तन,मन और सर्वस्व गुरु के प्रतिसमर्पित करें ताकि हम गुरु की कृपा से अच्छे मानव बनने में समर्थ हो सकें। गुरु की महिमा अपरंपार है,इसे वही समझ सकता है जिसके ज्ञान रूपी नेत्र खुल गए हैं। सही अर्थों में देखा जाय तो जिन पर गुरु की कृपा होती है, उन पर परमात्मा की कृपा होती है क्योंकि गुरु ही शिष्य की अंतरज्योति को प्रकाशित करने में समर्थ है। बस आवश्यकता इस बात की है कि हम ऐसे गुरुओं का सम्मान करें, वंदन करें, अभिनंदन करें जो हमारा वर्तमान और भविष्य का पथ प्रशस्त कर सके।

तरुण कुमार दाधीच
36,सर्वऋतु विलास,मेन रोड,
उदयपुर(राज) 313001