संवेदनाओं का ढलता सूरज
‘ सुना है , वेनेजुएला में आये विनाशकारी भूकम्प ने हज़ारों लोगों को मौत की नींद सुला दिया है । कई शहर नष्ट हो गये हैं । चारों तरफ़ मौत का सन्नाटा पसरा हुआ है । ‘
‘ आपने सही सुना है….. दीनानाथ बाबू ! लेकिन…….’
‘ लेकिन….. क्या….. ? ‘
‘ लेकिन सिर्फ़ सहानुभूति के मरहम से उनके ज़ख़्म नहीं भरने वाले हैं । हमें उनकी मदद के लिए आगे आना होगा । ‘
‘ मतलब…..? ‘
‘ मतलब कि आप जैसे लक्ष्मी पुत्रों को इस हादसे में पीड़ित लोगों की मदद के लिए अपनी तिजोरी खोलना होगी । ‘
उन्होंने मेरी बात को अनसुनी करते हुए फ़रमाया , ‘ भाई ! कुछ भी कहो ! हम भारतवासी जितने भाग्यशाली हैं , उतने किसी और देश के नहीं । आप भी मेरी बात से निश्चित ही सहमत होंगे । ‘
मुझे उनसे ऐसी उम्मीद कभी न थी कि वे ऐसे नाज़ुक समय में भी ऐसी क्षुद्र स्वार्थ की बातें करेंगे । मैंने उन पर तंज़ कसते हुए कहा , ‘ दीनानाथ बाबू ! यों कहिए कि हम इस शहर के वासी बहुत भाग्यशाली हैं , जो प्राकृतिक आपदाओं से पूरी तरह सुरक्षित हैं । हमें और देशों – प्रदेशों से क्या लेना – देना ? और मैं तो यह कहूॅंगा कि आप जैसे दीनों के नाथों को इस शहर की भी चिंता करने की भी क्या जरूरत……? आपको तो केवल अपनी तिजोरी सुरक्षित रहना चाहिए । हैं न ! दीनानाथ बाबू …..? सही कहा न मैंने…..! ‘
मेरी बात अभी समाप्त भी नहीं हुई थी कि वे वहाॅं से दबे पाॅंव खिसक लिये । और ….. मैं…… मानवीय संवेदनाओं का ढलता हुआ सूरज निहारने लगा ।

अशोक आनन
जूना बाज़ार
मक्सी जिला – शाजापुर (म.प्र.)