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मेरे प्यारे भैया – मेरे गुरु

गुरु पूर्णिमा केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह अपने जीवन में ज्ञान देने वाले हर उस व्यक्ति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है, जिसने हमें सही रास्ता दिखाया। गुरु वह होता है जो अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाए। गुरु केवल स्कूल में पढ़ाने वाला शिक्षक ही नहीं होता, बल्कि जीवन में जो भी हमें सही-गलत का अंतर समझाए, हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा दे, हमारी गलतियों को सुधारकर हमें बेहतर इंसान बनाए, वह भी हमारा गुरु होता है।

महर्षि वेदव्यास प्राचीन भारत के महान ऋषि, विद्वान और लेखक माने जाते हैं। उन्हें भारतीय संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण ज्ञानियों में गिना जाता है। उन्हीं की याद में गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है। उनका पूरा नाम कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास था। वेदव्यास नाम उनका इसलिए पड़ा क्योंकि उन्होंने चारों वेदों को सुव्यवस्थित किया। इसी कारण उन्हें आदि गुरु भी कहा जाता है।

मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना की, जबकि भगवान गणेश जी ने उसे लिखा। कहा जाता है कि वेदव्यास जी श्लोक बोलते जाते थे और गणेश जी उन्हें लिखते जाते थे। इस घटना से हमें एक बहुत सुंदर सीख मिलती है कि किसी भी महान कार्य के लिए ज्ञान, धैर्य और सहयोग तीनों का होना बहुत आवश्यक है।

इसी बात को जब मैं अपने जीवन से जोड़कर देखती हूँ, तो मुझे अपने प्यारे केशव भैया की याद आती है। जैसे महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास ने की और गणेश जी ने उसे सुंदर रूप में लिखा, वैसे ही मेरी लेखनी को सही दिशा देने का काम मेरे भैया करते हैं। जब भी मैं कोई कहानी लिखती हूँ, कोई लेख लिखती हूँ या कुछ नया सीखने की कोशिश करती हूँ, तब मेरे भैया हमेशा मेरी गलतियों को प्यार से सुधारते हैं।

वह कभी डाँटकर नहीं, बल्कि समझाकर कहते हैं, “काजल, यह मात्रा ऐसे नहीं, ऐसे लगेगी।” फिर मुस्कुराकर कहते हैं, “इस वाक्य में यह शब्द ठीक नहीं है, इसे ऐसे लिखो तो और अच्छा लगेगा।” शुरुआत में मुझे लगता था कि इतनी छोटी-छोटी गलतियों पर ध्यान देने की क्या ज़रूरत है। लेकिन धीरे-धीरे मुझे समझ आया कि यही छोटी बातें आगे चलकर हमारी सबसे बड़ी ताकत बनती हैं।

कई बार ऐसा भी हुआ कि मैंने पूरी कहानी लिख ली और मुझे लगा कि अब इसमें कोई गलती नहीं है। लेकिन जब भैया ने पढ़ा तो उन्होंने कुछ शब्द बदले, कहीं मात्रा ठीक की, कहीं वाक्य को थोड़ा सरल बनाया। पहले मुझे लगता था कि मेरी मेहनत पर सवाल उठाया जा रहा है, लेकिन बाद में समझ आया कि वह मेरी मेहनत को और सुंदर बना रहे हैं। उस दिन मैंने महसूस किया कि सच्चा गुरु वही होता है जो हमारी कमियों को छिपाता नहीं, बल्कि उन्हें दूर करने में हमारी मदद करता है।

मैंने अपने भैया से केवल लिखना ही नहीं सीखा, बल्कि धैर्य रखना भी सीखा। अगर कोई गलती हो जाए तो घबराना नहीं चाहिए, बल्कि उसे सुधारना चाहिए। गलती करना बुरा नहीं है, गलती से कुछ न सीखना बुरा है।

एक छोटी-सी बात मुझे हमेशा याद रहती है। जब मैं जल्दी-जल्दी लिखती थी, तो बहुत सारी मात्राएँ गलत हो जाती थीं। भैया कहते थे, “काजल, लिखने से पहले सोचो और लिखने के बाद एक बार पढ़ो।” पहले मुझे यह बात साधारण लगती थी, लेकिन आज जब मैं अपनी पुरानी कॉपियाँ देखती हूँ, तो समझ आता है कि उनकी यही सीख मुझे धीरे-धीरे बेहतर बना रही थी।

कभी-कभी मैं किसी शब्द का अर्थ नहीं समझ पाती थी। तब भैया केवल उत्तर नहीं बताते थे, बल्कि कहते थे, “पहले खुद सोचो, फिर हम साथ में समझेंगे।” इससे मुझे केवल उत्तर नहीं मिला, बल्कि सोचने की आदत भी बनी। शायद यही एक अच्छे गुरु की पहचान होती है। वह केवल जवाब नहीं देता, बल्कि जवाब तक पहुँचने का रास्ता भी सिखाता है।

आज जब मैं कोई नई कहानी लिखती हूँ, तो सबसे पहले यही सोचती हूँ कि अगर भैया इसे पढ़ेंगे तो क्या कहेंगे। कहीं कोई मात्रा तो गलत नहीं है? कहीं कोई वाक्य अधूरा तो नहीं है? यह सोच मुझे हर बार और अच्छा लिखने की प्रेरणा देती है।

कहते है ,ज्ञान बाँटने से बढ़ता है और सम्मान देने से रिश्ते मजबूत होते हैं।”

मेरे भैया ने कभी यह नहीं सोचा कि उन्हें अपना समय क्यों देना चाहिए। उन्होंने हमेशा मुझे सिखाने की कोशिश की। जब भी मैं कोई नई चीज़ सीखती हूँ, उसके पीछे कहीं न कहीं उनका मार्गदर्शन होता है। इसलिए मेरे लिए वह केवल बड़े भाई नहीं, बल्कि मेरे गुरु भी हैं।

गुरु का महत्व शब्दों में बताना आसान नहीं है। गुरु हमें केवल किताबों का ज्ञान नहीं देते, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि सफलता मेहनत से मिलती है, ईमानदारी सबसे बड़ी ताकत है और सीखना कभी बंद नहीं करना चाहिए।

एक सुंदर विचार है,जो हमें हमारी गलती बताता है, वही हमें आगे बढ़ाता है।”

अगर जीवन में कोई हमारी गलती सुधारने वाला न हो, तो हम शायद कभी बेहतर इंसान नहीं बन पाएँगे। इसलिए जो हमें सही राह दिखाए, उसका हमेशा सम्मान करना चाहिए।

आज के समय में बहुत लोग सोचते हैं कि गुरु केवल स्कूल या कॉलेज में मिलते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। जीवन का हर वह व्यक्ति जो हमें कुछ अच्छा सिखा दे, हमारा गुरु बन जाता है। माता-पिता हमारे पहले गुरु होते हैं, शिक्षक हमें शिक्षा देते हैं, और कई बार हमारे अपने भाई-बहन भी हमें जीवन की बहुत बड़ी सीख दे जाते हैं।

मेरे लिए मेरे केशव भैया ऐसे ही गुरु हैं। उन्होंने मुझे केवल लिखना नहीं सिखाया, बल्कि मेहनत करना, धैर्य रखना और अपनी गलतियों से सीखना भी सिखाया। जब भी मैं हार मानने लगती हूँ, उनकी बातें मुझे फिर से आगे बढ़ने की हिम्मत देती हैं।

आज गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर मैं अपने जीवन के हर गुरु को प्रणाम करती हूँ। विशेष रूप से अपने प्यारे केशव विवेकी भैया को, जिन्होंने हर समय मेरी गलतियों को सुधारा, मुझे प्रोत्साहित किया और मेरी लेखनी को बेहतर बनाने में मेरा साथ दिया।

अंत में मैं केवल इतना कहना चाहती हूँ कि अगर हमारे जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है जो हमें हर दिन थोड़ा-थोड़ा बेहतर बनने की सीख देता है, तो हमें उसका सम्मान अवश्य करना चाहिए। क्योंकि गुरु का स्थान वास्तव में बहुत ऊँचा होता है।

गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

मैं पूरे सम्मान और श्रद्धा के साथ यह लेख अपने प्यारे केशव विवेकी भैया को समर्पित करती हूँ। मेरे लिए आप केवल मेरे बड़े भाई नहीं हैं, बल्कि मेरे मार्गदर्शक, मेरे शिक्षक और मेरे गुरु भी हैं। आपने मेरी हर छोटी-बड़ी गलती को सुधारा, मुझे धैर्य के साथ समझाया और हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि आपको हमेशा स्वस्थ, सुखी और सफल रखें। आपकी सीख हमेशा मेरी लेखनी और मेरे जीवन का मार्गदर्शन करती रहेगी।

काजल भावरी

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