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सशक्त भावाभिव्यक्ति से संपृक्त है – शून्य में छटपटाते हुए

  • पुस्तक -शून्य में छटपटाते हुए (कविता संग्रह)
  • कवयित्री- डा.रेखा खराड़ी 
  • प्रथम संस्करण – 2025
  • मूल्य -299 ₹
  • प्रकाशक-बोधि प्रकाशन, जयपुर 
  • समीक्षक -तरुण कुमार दाधीच 

विता मनुष्य के भावों और विचारों को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। कलमकार के मन में नाना प्रकार के विचारों का उदय होता है। वह जब इन विचारों को काव्य की कसौटी पर कसकर अपने भावों से संपृक्त करता है तब नई रचना का जन्म होता है। इसी प्रकार के भावों का प्राकट्य कवयित्री डा. रेखा खराड़ी के नवीनतम कविता संग्रह ‘‘शून्य में छटपटाते हुए’’ में दिखाई पड़ता है। संग्रह की सभी रचनाओं में स्वयं के मनोनुकूल विषयों पर कवयित्री ने अपनी अनुभूति को अभिव्यक्ति देने का सार्थक प्रयास किया है। इतना ही नहीं नवीन प्रतिमानों और बिंबों को आधार बनाकर सशक्त रचनाओं से कवयित्री ने अपने काव्यत्व से प्रभावित किया है।

‘‘शून्य में छटपटाते हुए’’ संग्रह की पहली रचना ‘‘प्रेम लिख रही हूँ’’ बहुत ही प्रभावशाली बन पड़ी है। कवयित्री का मानना है कि विशुद्ध प्रेम ही दीर्घायु होता है। ऐसे ही भावों से संपृक्त विशुद्ध प्रेम भावना का सहज प्रकटीकरण पठनीय बन पड़ा है –

प्रेम…

महज आकर्षक नहीं 

उत्तरदायित्व है या यूँ कह लो 

अपने प्रिय के प्रति 

तुम्हारी जवाबदेही 

प्रेम रीत है या एक व्यवस्था 

जिसका तुम्हें पालन करना है 

घमण्ड, द्वेष, कटुता समीप न हो 

न भोगवाद का आशय हो

संग्रह की शीर्षक कविता ‘‘शून्य में छटपटाते हुए’’ में कवयित्री रेखा की वेदना अपने चरम पर पहुँच कर अभिव्यक्त हुई है। इस दृष्टि से कविता की निम्नोंक्त पंक्तियां प्रभावित करती हैं –

तेरा अनकहा प्रेम 

पिघल कर 

मेरी संवेदनाओं में 

बार बार 

बिखरने लगता है 

गुजरा वो पल अपना 

वजूद तलाशती मैं 

भटकते-उलझते

शून्य में छटपटाते हुए

एक एक कर कविताएँ पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है जैसे समस्त रचनाएँ बिना विश्राम के पढ़ी जानी चाहिए। ‘‘अप्राप्य की चाह में’’ कविता में कवयित्री का ज्ञात-अज्ञात प्रियतम के प्रति स्नेह भाव स्वाभाविकता के साथ व्यक्त हुआ है। प्रस्तुत कविता में रेखा खराड़ी की रहस्यवादी भावना प्रकट होती है जब आत्मा, परमात्मा से एकाकार चाहती है और शाश्वत एकाकार में उसे आशा की किरण दिखाई पड़ती है-

अतृप्त हृदय अप्राप्य की चाह में 

तरसता रहा है उम्र भर पाने को 

अब तो दग्ध हृदय को तृप्ति दे दो

उद्ररित होते रहते हैं राग-विराग

अलापता रहता है उन्हें रात भर

अब तो मिलन का गान दे दो

‘‘नारी तेरा जीवन संघर्ष’’ कविता में कवयित्री ने नारी के जीवन को संघर्षमय बताया है। वह कहती हैं कि नारी को अपनी अनेक इच्छाओं का दमन करना होता है, फिर भी वह सतत् रूप से आगे बढ़ती रहती है –

स्वच्छंद गगन सामने होगा 

पर कोई कोना न तेरा होगा 

उड़ना जब चाहो पंख फैलाकर 

तब पंखों को तेरे कटना होगा

एक अन्य कविता ‘‘जीवन समंदर’’  में रेखा ने निरंतर आगे बढ़ते रहने का आह्वान किया है। कवयित्री का मानना है कि धारा की दिशा में बहते रहने की बजाय धारा की विपरीत दिशा में जीवन रूपी नाव में बहकर जीवन को सुखमय बनाया जा सकता है। कविता की अधोलिखित पंक्तियाँ दृष्टव्य है –

संग्रह की सभी कविताओं में कवयित्री का शब्द चयन एवं शब्द संयोजन उच्च कोटि का बन पड़ा है। प्रस्तुत काव्य संग्रह में पूरी 100 कविताओं को संग्रहित किया है। सभी कविताएँ पाठकों को प्रभावित करने में समर्थ हैं। एक ओर जहाँ पुस्तक का आवरण सुंदर बन पड़ा है वहीं विख्यात साहित्यकार दिनेश जी पांचाल के पुस्तक के बारे में उद्गार सटीक सिद्ध होते हैं। बधाई।

ये जीवन समंदर 

तूफानों से कम नहीं 

साहिल से कश्ती लाता है कौन?

गर डूबो दे कोई लोक लाज की नैया 

डूबे हुए को फिर बचाने आता है कौन?

इसके अलावा यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्रस्तुत संग्रह पठनीय होने के साथ साथ संग्रहणीय बन पड़ा है। कवयित्री डा.रेखा खराड़ी की कलम से सृजित रचनाएँ पाठकों को प्रभावित करने में समर्थ हैं।

निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि कवयित्री के आलोच्य कविता संग्रह का साहित्य जगत में स्वागत होगा।

शुभकामनाएँ!

तरुण कुमार दाधीच

उदयपुर (राजस्थान)

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