लेख

मेरे व्यक्तित्व के शिल्पकार मेरे पापा

— एक बेटी की कलम से

पापा,

जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनकी महत्ता समय के साथ और बढ़ती जाती है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, अनुभव बढ़ते हैं और जिम्मेदारियाँ बढ़ती हैं, वैसे-वैसे यह एहसास भी गहरा होता जाता है कि हमारे व्यक्तित्व की नींव किन हाथों ने रखी थी। मेरे जीवन में वह हाथ आपके हैं, पापा।

जब मैं बहुत छोटी थी, तब इस दुनिया को देखने-समझने की मेरी क्षमता बहुत सीमित थी। उस समय आपने मेरी नन्हीं उंगली पकड़कर मुझे चलना सिखाया। जब मैं गिरती थी, तो आप संभाल लेते थे। जब डरती थी, तो आपका हाथ मेरे सिर पर आ जाता था। आपकी गोद मेरे लिए सबसे सुरक्षित स्थान थी और आपका साथ मेरे लिए सबसे बड़ा साहस।

मुझे आज भी याद है कि किस तरह आप मुझे अपने साथ घुमाने ले जाते थे। छोटी-छोटी खुशियों में मुझे शामिल करते थे। मेरी हर जिज्ञासा का उत्तर देते थे। दुनिया मेरे लिए एक अनजान जगह थी, लेकिन आपके साथ वह सुंदर और सरल लगती थी।

धीरे-धीरे आपने मुझे अक्षरों से परिचित कराया। शिक्षा का महत्व समझाया। केवल पढ़ना-लिखना ही नहीं, बल्कि जीवन को पढ़ना भी सिखाया। आपने बताया कि सम्मान कैसे अर्जित किया जाता है, रिश्तों को कैसे निभाया जाता है और कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य कैसे बनाए रखा जाता है।

समय बीतता गया और मैं बड़ी होती गई। आज मैं अपने निर्णय स्वयं लेने की क्षमता रखती हूँ। अपने कार्यों की जिम्मेदारी समझती हूँ। जीवन के अनेक क्षेत्रों में आगे बढ़ने का प्रयास कर रही हूँ। लेकिन पापा, एक बात आज भी नहीं बदली है—मुझे आपकी आवश्यकता आज भी उतनी ही है जितनी बचपन में थी।

फर्क बस इतना है कि तब मुझे आपकी उंगली की आवश्यकता थी और आज मुझे आपके आशीर्वाद, आपके विश्वास और आपके संबल की आवश्यकता है।

आप मेरे जीवन के सबसे बड़े प्रेरणा-स्रोत हैं। जब भी जीवन में कोई चुनौती सामने आती है, तब आपकी दी हुई सीख रास्ता दिखाती है। जब भी मन विचलित होता है, तब आपके संस्कार मुझे संभाल लेते हैं। जब भी आत्मविश्वास डगमगाता है, तब आपकी कही हुई बातें मुझे फिर से खड़ा कर देती हैं।

पापा, आपने मुझे कभी केवल अपनी प्यारी गुड़िया बनाकर नहीं रखा। आपने मुझे एक मजबूत और आत्मनिर्भर महिला के रूप में देखने का सपना देखा। आपने मुझे यह नहीं सिखाया कि जीवन में केवल सहारा लेना है, बल्कि यह सिखाया कि स्वयं दूसरों का सहारा कैसे बनना है।

आपने मुझे बताया कि नारी की शक्ति उसकी संवेदनशीलता में भी होती है और उसके साहस में भी। आपने सिखाया कि परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, स्वयं पर विश्वास कभी नहीं खोना चाहिए। आपने समझाया कि जीवन में संघर्ष आएँगे, लेकिन उनसे घबराने के बजाय उनका सामना करना चाहिए।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो महसूस करती हूँ कि मेरे व्यक्तित्व का हर मजबूत पक्ष कहीं न कहीं आपकी शिक्षा और संस्कारों से जुड़ा हुआ है। मेरी सोच, मेरा आत्मविश्वास, मेरा साहस और समाज के प्रति मेरी संवेदनशीलता—इन सबके मूल में आपका ही योगदान है।

यदि आपने मुझे संघर्ष करना न सिखाया होता, तो शायद मैं अपनी राह स्वयं न बना पाती। यदि आपने मुझे अपने विचार रखने का साहस न दिया होता, तो शायद मैं अपनी भावनाओं को इस तरह व्यक्त भी न कर पाती। यदि आपने मुझ पर विश्वास न किया होता, तो शायद मैं स्वयं पर भी विश्वास करना नहीं सीख पाती।

आपने मुझे केवल जन्म नहीं दिया, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाई। आपने मुझे केवल सपने देखने की प्रेरणा नहीं दी, बल्कि उन्हें पूरा करने का साहस भी दिया। आपने मुझे केवल सफलता का महत्व नहीं समझाया, बल्कि अच्छे इंसान बनने का महत्व भी बताया।

आज यदि मैं परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए कुछ सकारात्मक करने का प्रयास कर रही हूँ, यदि मैं लोगों के जीवन में आशा और प्रेरणा का दीप जलाने का प्रयास कर रही हूँ, तो उसके पीछे आपके संस्कारों की अमूल्य पूंजी है।

पापा, आपके प्रति मेरा आभार शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। आपके त्याग, आपके प्रेम, आपके विश्वास और आपके मार्गदर्शन का ऋण मैं कभी नहीं चुका सकती। लेकिन इतना अवश्य कह सकती हूँ कि आपकी बेटी होने पर मुझे गर्व है।

मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूँ कि आपका आशीर्वाद सदैव मेरे साथ बना रहे। जीवन के हर मोड़ पर आपकी सीख मेरा मार्गदर्शन करती रहे और मैं अपने कर्मों से आपके संस्कारों का सम्मान कर सकूँ।

धन्यवाद पापा।

मुझे चलना सिखाने के लिए,
मुझे संभालना सिखाने के लिए,
मुझे संघर्ष करना सिखाने के लिए,
और सबसे बढ़कर मुझे एक सशक्त,

आत्मविश्वासी और संवेदनशील इंसान बनाने के लिए।

आप मेरे जीवन की शक्ति हैं,
मेरे व्यक्तित्व की नींव हैं,
और मेरे सबसे बड़े प्रेरणा-स्रोत हैं

आपकी बेटी
ऋतु गर्ग

सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल 

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