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बेटी की माँ

ससुराल गयी रंजना पहली बार अपने मायके आ रही थी। साथ में उसका पति राजेश भी था। दोनों बहुत खुश थे। जैसे ही उसने मायके की देहरी पर कदम रखा; उसकी नजर माँ शांता पर पड़ी। देखा कि माँ की आँखों में इकलौती बेटी का इंतजार है; एक अगाध स्नेह माँ के मुस्कुराते ओठों से छलछला रहा है। रंजना ने शांता के पैर छुए। शांता की नीरबूँदें लुढ़क गयी। रंजना को अपनी बाँहों में भरकर उसका मन खूब रोने को कर रहा था। ज्यों ही शांता रोने लगी, रंजना ने यह कहकर उसे मना कर दिया कि माँ…! मुझे रोना-धोना अच्छा नहीं लगता। अब गया वो जमाना। मैं खुश हूँ न, तुम भी खुश रहो। देहातियों का काम है यह सब। मैं आज की लड़की हूँ…आज की बेटी हूँ। आय अम अ मॉडर्न गर्ल। फिर क्या करती बेचारी शांता; पिल्लर को पकड़ कर रोने लग गयी।

आज रंजना अपनी बेटी रिया को ससुराल विदा कर रही है। उसे पिछले इक्कीस साल का वो पल याद आ रहा है। रंजना ही रिया से लिपटकर रो रही है; पर उसकी आँखों में बेटी रिया की विदाई के आँसू से ज्यादा माँ शांता की यादों के आँसू हैं।

टीकेश्वर सिन्हा ‘गब्दीवाला’

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