युवा हूँ मैं
मैं दीप नहीं जो बुझ जाऊँ,
मैं सूर्य हूँ, फिर आऊँगा।
विपदाओं के काले बादल
चीर गगन पर छा जाऊँगा।
मैं युवा हूँ इस भारत का,
सपनों का निर्माण हूँ मैं,
माटी की सौंधी खुशबू का
जीवित हिंदुस्तान हूँ मैं।
हार मुझे कब रोक सकी है,
ठोकर ने चलना सिखलाया,
काँटों भरे कठिन पथों ने
मुझको हँसकर बढ़ना सिखाया।
जब-जब दुनिया ने ठुकराया,
मन ने साहस फिर भर डाला,
टूटे हुए इरादों को भी
मैंने फिर से गढ़ डाला।
मैं नदियों सा बहता जाऊँ,
रुकना मुझको आता नहीं,
अंधियारे लाख खड़े हों पर
सूरज डरकर जाता नहीं।
मंज़िल उनको मिलती है जो
आँधी में भी चलते हैं,
पत्थर से टकराकर भी जो
नदियों जैसे बहते हैं।
उठो जवानों! समय पुकारे,
अब आलस में सोना क्या?
जिस धरती ने जन्म दिया है,
उसके लिए न होना क्या?
कलम उठाओ, ज्ञान जगाओ,
नव निर्माण का गीत लिखो,
अपने श्रम के स्वर्ण अक्षरों से
भारत का भविष्य लिखो।
ना जाति-धर्म की दीवारें,
ना मन में कोई भेद रहे,
प्रेम, करुणा और मानवता
हर दिल में सदा खेद रहे।
ऐसी ज्योति जलानी होगी
जिससे हर घर रोशन हो,
भारत फिर से विश्वगुरु बने,
हर जन का जीवन पावन हो।
मैं युवा हूँ, मैं शक्ति हूँ,
मैं परिवर्तन की आशा हूँ,
संघर्षों की अग्नि में तपकर
उज्ज्वल भारत की भाषा हूँ।

राजू प्रजापति ‘‘त्रिवेणी’’
बोकारो (झारखंड)