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विरोध

एक नए राजनीतिक दल ने कल शहर बंद करने की घोषणा कर दी। शहर के बुजुर्ग कारोबारी आत्माराम अपने शभचिंतकों के साथ उस राजनीतिक दल के अध्यक्ष के पास पहुंचे। उन्हें समझाते हुए कहा, ‘‘यहाँ से 1700 कि.मी. दूर दुसरे राज्य में जातिगत दंगे हुए हैं। उन सारे दंगाईयों को पुलिस पकड़ भी चुकी है। फिर दुकानें बंद रखने का कोई औचित्य समझ में नहीं आता है।’’ लेकिन अध्यक्ष दुकानें बंद करवाने के अडियल निर्णय से टस से मस नहीं हुए। आत्माराम ने चेतावनी देते हुए उनसे कहा, ‘‘दो-दो लाकडाउन के कारण वैसे भी दुकानदारों की आर्थिक स्थिति ख़राब हैै, ऊपर से कल हाट का दिन हैै। आस-पास के गांववासी ख़रीदारी के लिए आते हैं। उन्हें तकलीफ़ होगी और हमारी कमाई पर बुरा असर होगा सो अलग। बेहतर होगा कि सिर्फ़ जुलूस निकालकर अपना विरोध प्रकट करो।’’

आत्माराम ने शहर के सभी दुकानदारों से अपील करते हुए कहा कि कल दुकानें चालू रखनी हैं और बंद करवाने वाले कार्यकर्ताओं से इस तरह भिड़ना हैै कि वो भविष्य में दुकानें बंद करवाने की हिम्मत न कर सकें। सभी ने एकजुटता दिखाने का वादा किया। सुबह 11 बजे राजनीतिक दल के कार्यकर्ता नारे लगाते पूरे जोश के साथ आगे बढ़ रहे थे। उनके साथ सिर्फ़ चार पुलिसकर्मी थे। दुकानें खुली देखकर कार्यकर्ता आग-बबूला हो गए। दुकानें बंद करवाने के लिए आक्रमण करने की सोच रहे थे कि उन्होंने जो दृश्य देखा उसकी उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी। सभी दुकानदार अपने-अपने हाथों में लाठियाँ लेकर, उनका मुकाबला करने के लिए तैयार खड़े थे। कार्यकर्ताओं ने अपने अध्यक्ष की ओर देखा। अध्यक्ष ने ईशारों से सबको चुपचाप आगे बढ़ने को कहा। कारोबारियों के हौसलों के आगे वे पस्त हो गए। शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन समाप्त करना पड़ा। बात-बात पर दुकानें बंद करवाने वालों के साथ ऐसा व्यवहार उचित है या अनुचित????

अशोक वाधवाणी

कोल्हापुर, महाराष्ट्र

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