FeaturedHighlightsTop StoriesTrendingकहानीकहानी व लेख

केवड़ा

जब लोग किसी गाँव की पहचान उसके स्कूल, मंदिर, मस्जिद, तालाब, पहाड़, बाज़ार या प्रवेश द्वार से करते हैं, तब वे उस गाँव की आत्मा को नहीं पहचानते। आत्मा तो अक्सर किसी ऐसी चीज़ में छिपी होती है जिसे नक्शों में नहीं दिखाया जा सकता। पूर्वांचल के एक भूले-बिसरे गाँव की आत्मा एक सुगंध थी। उस गाँव का नाम था घासीपुर। जहाँ हमने पगडंडी की आवाज़ सुनी, बहुत समय पहले की बात है। समुद्र और मैदानों के बीच फैले एक प्रदेश में ‘‘सरलोक वन’’ नाम का एक अद्भुत उपवन था। वह साधारण बगीचा नहीं था। वहाँ फूल केवल खिलते नहीं थे, वे सोचते थे, बोलते थे, स्मृतियाँ सँजोते थे और ऋतुओं के साथ जीवन के अर्थ पर विचार करते थे। उस उपवन के मध्य में कोई राजसिंहासन नहीं था, न कोई महल। वहाँ एक पुरानी बावली थी, जिसके चारों ओर फूलों की अनेक जातियाँ रहती थीं, लेकिन उन सबमें सबसे अधिक सम्मान एक फूल को प्राप्त था- केवड़ा।

केवड़ा दिखने में सबसे आकर्षक नहीं था। उसके आसपास काँटे थे, उसका फूल पत्तियों के भीतर छिपा रहता था और पहली दृष्टि में कोई उसे देखकर मुग्ध नहीं होता था। फिर भी पूरे सुरलोक वन की आत्मा उसी में बसती थी। उसकी सुगंध ऐसी थी जो केवल नाक तक नहीं पहुँचती थी; वह स्मृतियों, सपनों और हृदय के सबसे गहरे कक्षों तक उतर जाती थी। उसी बावली में कमल रहता था। कमल का संसार जल था। वह सुबह सूरज के साथ जागता और शाम होते-होते अपनी पंखुड़ियाँ समेट लेता। उसे अपनी निर्मलता पर गर्व था, लेकिन वह भीतर से अकेला था। उपवन के पूर्वी भाग में गुलाब का राज्य था। गुलाब सुंदर था, लोकप्रिय था और उसे अपने रूप का ज्ञान भी था। उसके आसपास हमेशा तितलियाँ मंडराती रहतीं, लेकिन उसके काँटे उसे दूसरों से एक दूरी पर भी रखते थे। दक्षिणी कोने में चंपा रहती थी। वह उपवन की सबसे बुद्धिमान फूल मानी जाती थी। उसकी सुगंध धीमी थी, पर उसके शब्द गहरे थे। रात होते ही रातरानी जागती थी। दिन भर वह मौन रहती, लेकिन अँधेरा उतरते ही उसकी महक पूरे वन में संगीत की तरह फैल जाती और रजनीगंधा…

वह सबसे कोमल थी। उसे लोग चाँदनी की बेटी कहते थे। उसकी उपस्थिति से रातों में एक शांत उजास फैल जाता था। इन सबके बीच केवड़ा एक मित्र, एक श्रोता और एक मार्गदर्शक की तरह था। एक वर्ष बैसाख असाधारण रूप से सुंदर आया। नीम के फूल झर रहे थे। अमलतास पीले दीपकों की तरह चमक रहा था। दूर गाँवों से बांसुरी की धुनें आ रही थीं। कुओं में सुगंधित जल डाला जा रहा था। महुए की गंध हवा में घुली हुई थी। ऐसी ही एक शाम सभी फूल बावली के किनारे एकत्र हुए।

कमल ने कहा, ‘‘क्या कभी तुम्हें लगता है कि हम केवल कुछ दिनों के मेहमान हैं? खिलते हैं, महकते हैं, चहकते हैं और फिर मिट जाते हैं।’’ गुलाब हँसा। ‘‘मुझे मिटने की चिंता नहीं। जब तक मैं हूँ, लोग मुझे याद रखते हैं।’’ रातरानी बोली, ष्याद रखा जाना और याद बन जाना अलग बातें हैं।’’ चंपा मुस्कुराई, ‘‘और स्मृति की सबसे लंबी आयु सुगंध की होती है।’’ सबकी निगाहें केवड़े की ओर उठीं। केवड़ा कुछ देर मौन रहा। फिर बोला, ‘‘फूलों का जीवन पंखुड़ियों में नहीं, उन हृदयों में रहता है जिन्हें वे छूते हैं।’’ सब चुप हो गए।

उसी समय उपवन में एक नई अतिथि आई। वह कोई फूल नहीं थी। वह एक युवती थी। उसका नाम था फुलिया। वह पास के गाँव की रहने वाली थी। लोग उसे ‘‘केवड़ा कन्या’’ कहते थे, क्योंकि उसका स्वभाव केवड़े जैसा था। वह सुंदर थी, लेकिन अपनी सुंदरता का प्रदर्शन नहीं करती थी। वह कोमल थी, लेकिन अन्याय के सामने झुकती नहीं थी। उसकी उपस्थिति में लोग सहज महसूस करते थे। फुलिया प्रतिदिन उपवन में आती और फूलों से बातें करती। धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि प्रत्येक फूल जीवन का एक अलग सत्य सिखाता है। कमल ने उसे सिखाया कि कीचड़ में रहकर भी निर्मल रहा जा सकता है। गुलाब ने सिखाया कि आकर्षण के साथ आत्मरक्षा भी आवश्यक है। चंपा ने सिखाया कि ज्ञान की सुगंध सबसे स्थायी होती है। रातरानी ने बताया कि कुछ लोग अंधेरों में सबसे अधिक चमकते हैं। रजनीगंधा ने उसे धैर्य का अर्थ समझाया और केवड़े ने…

केवड़े ने उसे सिखाया कि मनुष्य का मूल्य उसके बाहरी रूप में नहीं, उसकी भीतरी सुगंध में होता है। समय बीतता गया। एक दिन राज्य का राजकुमार उस प्रदेश में आया। वह फुलिया से प्रभावित हुआ। उसने विवाह का प्रस्ताव रखा। पूरा गाँव उत्साहित हो गया। लेकिन फुलिया ने कहा, ‘‘मैं किसी की संपत्ति बनकर नहीं जी सकती। यदि कोई मेरे साथ चलना चाहता है, तो उसे मेरे समान चलना होगा।’’ लोगों ने उसकी आलोचना की। उसे अभिमानी कहा गया। कई लोगों ने कहा कि उसने जीवन का सबसे बड़ा अवसर खो दिया। उस रात फुलिया रोती हुई उपवन में पहुँची। कमल ने पूछा, ‘‘दुखी हो?’’

‘‘थोड़ी।’’

गुलाब बोला,

‘‘तुम चाहो तो अपने निर्णय से पीछे हट सकती हो।’’

फुलिया ने सिर हिलाया।

‘‘नहीं।’’

चंपा ने पूछा, ‘‘तो फिर पीड़ा किस बात की है?’’

फुलिया बोली, ‘‘लोग मुझे समझना नहीं चाहते।’’

तभी केवड़े की सुगंध हवा में घुली और उसने कहा,

‘‘सुगंध को पहचानने में समय लगता है। तेज़ रंग तुरंत दिखाई देते हैं, लेकिन गहरी महक धीरे-धीरे हृदय में उतरती है।’’ फुलिया मुस्कुरा दी। वर्ष बीत गए। उसने गाँव में एक पाठशाला खोली। स्त्रियों को पढ़ना सिखाया। कुओं की मरम्मत करवाई। लोकगीतों को संकलित किया। बच्चों को पेड़ लगाने की शिक्षा दी। धीरे-धीरे वही लोग, जिन्होंने कभी उसकी आलोचना की थी, उसका सम्मान करने लगे। एक वर्ष भयंकर सूखा पड़ा। तालाब सूख गए। फूल मुरझाने लगे। कमल का जल कम हो गया। गुलाब की पंखुड़ियाँ झरने लगीं। रातरानी की महक मंद पड़ गई। रजनीगंधा उदास रहने लगी, लेकिन केवड़ा अब भी खड़ा था। काँटों से घिरा हुआ। सूरज की तपिश झेलता हुआ। अपनी सुगंध बाँटता हुआ।

फुलिया ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘तुम टूटते क्यों नहीं?’’ केवड़ा मुस्कुराया, ‘‘क्योंकि मेरी जड़ें कठिनाइयों की मिट्टी में हैं।’’ उस वर्ष गाँव ने केवड़े से जीना सीखा। सूखा समाप्त हुआ। बारिश लौटी। तालाब भर गए। फूल फिर खिल उठे और इंसान बेहया जैसे। लेकिन अब सब बदल चुके थे। उन्हें समझ आ गया था कि सौंदर्य क्षणिक हो सकता है, पर चरित्र की सुगंध दीर्घजीवी होती है। बहुत वर्षों बाद जब फुलिया वृद्ध हुई, तो एक बैसाखी रात वह उसी बावली के पास बैठी थी। चाँद नववधू के कपोल की तरह चमक रहा था। हवा में महुए, आम और केवड़े की मिली-जुली सुगंध थी। दूर कहीं बांसुरी बज रही थी। उसने चारों ओर देखा। कमल अब भी जल में था। गुलाब अब भी महक रहा था। चंपा अब भी ज्ञान की तरह शांत थी। रातरानी अंधेरे को सुगंधित कर रही थी। रजनीगंधा चाँदनी में मुस्कुरा रही थी और केवड़ा… वह अब भी उसी तरह खड़ा था। सादा। संयमी। सुगंध से भरा।

फुलिया ने आँखें बंद कीं और धीरे से कहा, ‘‘अब समझी हूँ कि प्रेम क्या है’’ हवा ने पूछा, ‘‘क्या?’’ फुलिया बोली, ‘‘प्रेम गुलाब का आकर्षण है, कमल की निर्मलता है, रातरानी का रहस्य है, रजनीगंधा का धैर्य है, चंपा का ज्ञान है; लेकिन इन सबको एक साथ बाँधने वाली जो अदृश्य शक्ति है, उसका नाम केवड़ा है।’’ उसी क्षण बैसाख की हवा चली। सभी फूलों की सुगंधें एक-दूसरे में घुल गईं और सुरलोक वन में उपस्थित हर जीव ने महसूस किया कि जीवन का सबसे बड़ा सौंदर्य दिखाई नहीं देता, वह केवल महसूस किया जाता है, ठीक केवड़े की महक की तरह। तभी से उस प्रदेश में एक कहावत प्रचलित हुई, ‘‘रूप आँखों को बाँधता है, पर सुगंध आत्मा को और जो आत्मा को छू ले, वही अमर हो जाता है।’’

गोलेन्द्र पटेल

चंदौली (उत्तर प्रदेश)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *