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विश्व पर्यावरण दिवस

धरती का हर कण कहता है,

मुझमें जीवन का सार बसता,

नदियों की कल-कल ध्वनि में,

भविष्य का मधुर स्वर हँसता।

वन की हरियाली से सजता,

इस धरा का अनुपम श्रृंगार,

पर्वत, सागर, नभ और उपवन,

प्रकृति के यह अमूल्य उपहार।

मगर मानव की गलत चाहत ने,

कितने घाव दिए हैं संसार को,

कटते वन, दूषित होती नदियाँ,

चुनौती देते हैं यह जीवन को।

आओ आज यह प्रण दोहराएँ,

हरियाली का मान हम बढ़ाएँ,

एक-एक पौधा रोपित करके,

धरती का ऋण कुछ चुकाएँ।

अनुराग उपाध्याय

मुरैना, मध्य प्रदेश

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