माँ साधना है
माँ को कभी अधूरा लिखूँ,
कभी पूरा लिखूँ,
कभी रात लिखूँ,
कभी दिन लिखूँ।
सावन की बारिश लिखूँ,
अपनी जिंदगानी लिखूँ,
भीगी पलके है,
उम्मीद जैसे है।
समय का पहला सूर्याेदय लिखूँ,
तो चाँद की रोशनी लिखूँ।
जैसे पतझड़ के बाद पीपल की पत्ती आई नई,
जैसे गंगा हिमालय से अविरल बही।
माँ की ममता वैसे ही रही,
जैसे शांत उपवन में,
फूलों की कलिया,
नई खिली।
जब एक किलकारी गूँजी,
भोर की पहली किरण फूटी,
उसने सहजता से स्वीकार किया।
माँ ने हमको के नया आगाज दिया।
वह जगी रात भर,
दिन के उजाले में,
एक प्यार दिया,
माँ ने मन दिया,
माँ ने धरती और आकाश दिया।
माँ साधना भी है,
माँ समाधान भी है।
पार्थ आशु,
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)