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पिता:मेरी ज़िंदगी के सच्चे नायक

‘‘पिता एक ऐसी किताब हैं, जिसके हर पन्ने पर त्याग, संघर्ष और प्रेम की कहानी लिखी होती है।’’ जब भी मैं इस सुविचार को पढ़ती हूँ, मुझे अपने पापा का चेहरा याद आ जाता है। मुझे लगता है कि अगर किसी ने त्याग, संघर्ष, मेहनत, जिम्मेदारी और प्रेम को एक ही व्यक्ति में समेटकर देखा हो, तो वह मेरे पापा हैं। अक्सर लोग कहते हैं कि भगवान हर जगह नहीं पहुँच सकते, इसलिए उन्होंने माता-पिता को बनाया। बचपन में यह बात सिर्फ एक कहावत लगती थी, लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई, मुझे समझ में आने लगा कि सचमुच माता-पिता ही हमारे जीवन के सबसे बड़े मार्गदर्शक होते हैं। मेरे लिए तो मेरे पापा किसी सुपरहीरो से कम नहीं हैं। फिल्मों के सुपरहीरो केवल पर्दे पर लोगों की मदद करते हैं, लेकिन मेरे पापा ने अपने पूरे जीवन में अपने परिवार के लिए जो किया है, वह किसी भी सुपरहीरो से कहीं बड़ा है।

मेरे पापा पढ़ाई में बहुत होशियार थे। उन्होंने बचपन से लेकर स्नातक (Graduation) तक हमेशा प्रथम श्रेणी में सफलता प्राप्त की। उनके शिक्षक और गाँव के लोग उनकी प्रतिभा की प्रशंसा करते थे। हर किसी को विश्वास था कि वे आगे चलकर बहुत ऊँची शिक्षा प्राप्त करेंगे और जीवन में बड़ी सफलता हासिल करेंगे। उनके मन में भी कई सपने थे। वे आगे पढ़ना चाहते थे, नई-नई चीज़ें सीखना चाहते थे और अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहते थे। लेकिन कई बार जीवन हमारी योजनाओं के अनुसार नहीं चलता। स्नातक की पढ़ाई पूरी होने के बाद उनके कंधों पर परिवार की जिम्मेदारियाँ आ गईं। घर की परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि उन्हें अपने सपनों से पहले अपने परिवार के बारे में सोचना पड़ा। उन्होंने बिना किसी शिकायत के अपनी आगे की पढ़ाई छोड़ दी और परिवार की जिम्मेदारियों को स्वीकार कर लिया। उस समय शायद उन्होंने अपने मन के कई सपनों को दबा दिया होगा, लेकिन उन्होंने कभी किसी के सामने इसका दुख व्यक्त नहीं किया। यही तो एक पिता की सबसे बड़ी पहचान होती है। ‘‘पिता अपने बच्चों के लिए अक्सर अपने सपनों का त्याग कर देते हैं, लेकिन कभी अपने कर्तव्यों का नहीं।’’

मेरे पापा केवल पढ़ाई में ही अच्छे नहीं थे, बल्कि खेलों में भी उनकी गहरी रुचि थी। उन्हें फुटबॉल खेलना बहुत पसंद था। गाँव के मैदान में उनकी एक टोली थी और वे हर सुबह सबसे पहले उठ जाया करते थे। जब पूरा गाँव नींद में होता था, तब मेरे पापा और उनके दोस्त मैदान में फुटबॉल की प्रैक्टिस कर रहे होते थे। उनके भीतर कुछ नया सीखने और खुद को बेहतर बनाने की अद्भुत लगन थी। वे मानते थे कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए सीखना कभी नहीं छोड़ना चाहिए। शायद यही कारण था कि आज भी वे हर नई चीज़ को समझने और सीखने का प्रयास करते हैं। उन्होंने हमें भी यही सिखाया कि इंसान की असली पहचान उसकी सीखने की इच्छा से होती है, न कि केवल उसकी उम्र या डिग्री से।

फुटबॉल के अलावा उन्हें संगीत से भी बहुत प्रेम था। उनकी आवाज़ बहुत अच्छी थी और उन्हें गाने का शौक था। वे अलग-अलग जगहों पर होने वाले जागरणों में भजन और गीत गाने जाया करते थे। संगीत उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। जब वे गाते थे, तो उन्हें खुशी मिलती थी। लेकिन धीरे-धीरे परिवार और समाज की कुछ परिस्थितियों के कारण उन्हें यह शौक भी छोड़ना पड़ा। कुछ लोगों को यह पसंद नहीं था कि वे रात भर जागरणों में जाएँ। परिवार की जिम्मेदारियाँ भी बढ़ती जा रही थीं। ऐसे में उन्होंने अपने इस प्रिय शौक को भी पीछे छोड़ दिया। शायद उनके मन को यह निर्णय लेने में दुख हुआ होगा, लेकिन उन्होंने परिवार की शांति और जिम्मेदारियों को अपनी खुशी से ऊपर रखा। यह त्याग हर किसी के बस की बात नहीं होती।

समय बीतता गया और हमारे परिवार की जिम्मेदारियाँ बढ़ती चली गईं। हम पाँच भाई-बहन थे और हम सबकी पढ़ाई, जरूरतें और भविष्य की चिंता पापा के कंधों पर थी। लेकिन मैंने कभी उन्हें घबराते नहीं देखा। मैंने कभी उन्हें यह कहते नहीं सुना कि वे थक गए हैं। जिम्मेदारियाँ बढ़ने का यह मतलब बिल्कुल नहीं था कि उन्होंने हमें समय देना कम कर दिया। इसके विपरीत, वे अपने काम के साथ-साथ हमारी पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान देते थे। वे समय निकालकर हमारा होमवर्क करवाते थे, हमारी पढ़ाई के बारे में पूछते थे और यह सुनिश्चित करते थे कि हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। कई बार जब हम पढ़ाई में किसी प्रश्न को नहीं समझ पाते थे, तो वे बड़े धैर्य से हमें समझाते थे। उनकी यही आदत हमें हमेशा प्रेरित करती रही।

बचपन में हमारी भी कई छोटी-बड़ी इच्छाएँ होती थीं। कभी कोई खिलौना चाहिए होता था, कभी कोई किताब, कभी कोई नई चीज़। जब हम अपने पापा से किसी चीज़ की माँग करते थे, तो वह चीज़ हमें उसी समय नहीं मिलती थी। लेकिन वे हमारी बात को अनसुना भी नहीं करते थे। वे पहले हमें उस चीज़ के फायदे और नुकसान समझाते थे। वे चाहते थे कि हम हर निर्णय सोच-समझकर लें। जब उन्हें लगता था कि वह चीज़ हमारे लिए सही है, तब वे उसे हमें दिला देते थे। कई बार ऐसा हुआ कि जिस चीज़ की हमने इच्छा की, वह अगले दिन हमारे हाथ में होती थी। उस समय शायद हमें यह नहीं पता था कि उस चीज़ को दिलाने के लिए उन्होंने कितनी मेहनत की होगी या कितने त्याग किए होंगे। लेकिन आज समझ में आता है कि बच्चों की छोटी-सी मुस्कान के लिए माता-पिता कितनी बड़ी कीमत चुकाते हैं।

मुझे आज भी वह घटना याद है जब मेरी फीस जमा करने की आखिरी तारीख थी। घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। मैं चिंतित थी कि कहीं मेरी पढ़ाई प्रभावित न हो जाए। लेकिन मेरे पापा ने किसी तरह पैसों का इंतज़ाम किया और समय पर मेरी फीस जमा कर दी। उस दिन मुझे महसूस हुआ कि मेरे पापा सचमुच सुपरहीरो हैं। उनके पास हर समस्या का कोई न कोई समाधान होता है। शायद वे जादू नहीं जानते, लेकिन उनका साहस, उनकी मेहनत और उनका विश्वास किसी जादू से कम भी नहीं है। ‘‘पिता वह छत है जो खुद धूप में जलते हैं, लेकिन अपने बच्चों को हमेशा छाँव देते हैं।’’

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो समझ पाती हूँ कि मेरे पापा ने हमारे लिए कितनी रातों की नींद त्यागी होगी। कितनी चिंताएँ उन्होंने अकेले झेली होंगी। कितनी बार उन्होंने अपनी जरूरतों को टालकर हमारी जरूरतों को पूरा किया होगा। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि सुबह होते ही उनके चेहरे पर वही ऊर्जा और वही मुस्कान दिखाई देती थी। वे कभी अपनी परेशानियों का बोझ हम पर नहीं डालते थे। यही तो जिम्मेदारी की असली पहचान है। जिम्मेदारी केवल परिवार का खर्च उठाना नहीं होती, बल्कि परिवार को सुरक्षित, खुश और आत्मविश्वासी महसूस कराना भी होती है।

मेरे पापा ने हमें केवल पढ़ाई नहीं सिखाई, बल्कि जीवन जीने का तरीका भी सिखाया। उन्होंने हमें बताया कि किसी भी काम को करने से पहले उसके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। उन्होंने हमें सिखाया कि जल्दबाजी में लिए गए निर्णय अक्सर गलत साबित होते हैं। उन्होंने हमेशा कहा कि कोई भी अच्छा या बुरा काम करने से पहले माता-पिता से सलाह लेनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने हमसे पहले दुनिया देखी है, जीवन के अनुभव प्राप्त किए हैं और वे हमारे भले के बारे में सोचते हैं। आज जब मैं जीवन की कठिनाइयों का सामना करती हूँ, तो मुझे अपने पापा की बातें याद आती हैं। उन्हीं से मैंने सीखा है कि समस्याओं से भागना नहीं चाहिए, बल्कि उनका सामना करना चाहिए।

मेरे लिए मेरे पापा केवल एक पिता नहीं हैं, बल्कि मेरे प्रेरणास्रोत हैं। जब भी मैं किसी कठिन परिस्थिति में होती हूँ, तो उनके संघर्ष याद करती हूँ। जब भी मुझे लगता है कि रास्ता कठिन है, तो मैं सोचती हूँ कि जिस व्यक्ति ने अपने सपनों का त्याग करके अपने परिवार को संभाला, जिसने हर मुश्किल का सामना मुस्कुराकर किया, जिसने कभी हार नहीं मानी, उसकी बेटी होकर मैं कैसे हार मान सकती हूँ? मेरे पापा ने मुझे सिखाया है कि सफलता केवल बड़े पद या बड़े धन का नाम नहीं है। सफलता का अर्थ है अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाना, अपने परिवार का साथ देना और जीवन की हर चुनौती का साहस के साथ सामना करना।

आज मैं गर्व से कह सकती हूँ कि मेरे पापा मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। उन्होंने मुझे सिखाया है कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता, जिम्मेदारियों से भागना नहीं चाहिए और परिवार से बढ़कर कुछ नहीं होता। मेरे लिए भगवान को देखने का सबसे आसान तरीका अपने पापा को देखना है क्योंकि उन्हीं की वजह से मैंने इस दुनिया को देखा, सही और गलत में फर्क करना सीखा और जीवन की हर छोटी-बड़ी खुशी का अनुभव किया। सच तो यह है कि जब पिता साथ होते हैं, तो दुनिया की सबसे कठिन राहें भी आसान लगने लगती हैं। महँगी से महँगी चीज़ भी सस्ती लगती है, क्योंकि मन में विश्वास होता है कि ‘‘पापा हैं न’’

अंत में मैं बस इतना कहना चाहूँगी कि यदि जीवन एक लंबी यात्रा है, तो मेरे पापा उस यात्रा के सबसे मजबूत सहयात्री हैं। यदि जीवन एक पुस्तक है, तो उसके सबसे सुंदर अध्याय मेरे पापा से जुड़े हुए हैं। और यदि मुझसे कोई पूछे कि मेरा सबसे बड़ा हीरो कौन है, तो मेरा उत्तर हमेशा एक ही होगा-मेरे पापा। क्योंकि मैंने संघर्ष उनसे सीखा है, जिम्मेदारी उनसे सीखी है, प्रेम उनसे सीखा है और जीवन जीना भी उनसे ही सीखा है। मेरे पापा मेरे लिए केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक प्रेरणा, एक विश्वास और मेरी पूरी दुनिया हैं।

‘‘पिता का प्यार शब्दों में कम और जिम्मेदारियों में अधिक दिखाई देता है।’’

काजल भाँवरी

गाजीपुर, उत्तर प्रदेश

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