बेटी की विदाई
गाँव के किनारे बने छोटे से घर में आज असामान्य हलचल थी। घर की दीवारें जैसे सजीव हो उठी थींकृहर कोना, हर आँगन, हर दरवाज़ा एक ही बात कह रहा था- ‘‘आज इस घर की बेटी विदा होगी..’’
श्यामलाल जी गंभीर चिंतन करते बरामदे में बैठे थे। सामने शादी की तैयारियाँ चल रही थीं, लेकिन उनकी आँखें कहीं और खोई हुई थीं। उनकी लाडली बेटी खुशी, जिसे कभी उन्होंने उँगली पकड़कर चलना सिखाया था, आज वो दुल्हन बनकर किसी और घर जाने वाली थी।
‘‘पापा…’’-खुशी की धीमी आवाज़ ने उन्हें वर्तमान में लौटा दिया।
उन्होंने देखा-लाल जोड़े में सजी खुशी, बिल्कुल किसी परी की तरह लग रही थी। लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी नमी थी।
‘‘क्या हुआ बेटा?’’-श्यामलाल जी ने प्यार से पूछा।
खुशी मुस्कुराने की कोशिश करती हुई बोली- ‘‘कुछ नहीं पापा… बस… सोच रही हूँ कि आज के बाद सब कुछ बदल जाएगा…’’
श्यामलाल जी ने उसकी बात काटते हुए कहा- ‘‘नहीं बेटा, सब कुछ नहीं बदलता… बस जिम्मेदारियाँ बदलती हैं। रिश्ता नहीं।’’
खुशी ने सिर झुका लिया, लेकिन उसके दिल में एक डर था-क्या सच में सब वैसा ही रहेगा?
शादी की रस्में और एक पिता का दिल
बारात आ चुकी थी। ढोल-नगाड़ों की आवाज़, मेहमानों की चहल-पहल, और रस्मों का सिलसिला… सब कुछ सामान्य था। लेकिन श्यामलाल जी के दिल में तूफान चल रहा था।
हर फेरे के साथ उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे उनकी ज़िंदगी का एक हिस्सा धीरे-धीरे उनसे दूर जा रहा हो।
जब कन्यादान का समय आया, तो पंडित जी ने कहा- ‘‘आज आप अपनी बेटी को एक नए जीवन के लिए समर्पित कर रहे हैं…’’
यह सुनते ही श्यामलाल जी की आँखें भर आईं। उन्होंने खुशी का हाथ दूल्हे के हाथ में रखते हुए धीरे से कहा- ‘‘इसे कभी अकेला मत छोड़ना… यह बाहर से मजबूत है, लेकिन दिल से बहुत नाजुक है…’’
विदाई-सबसे कठिन पल
वह समय आ गया, जिससे हर माता-पिता डरते हैं- विदाई का समय…
खुशी अपनी माँ से लिपटकर रो रही थी। उसकी माँ भी खुद को संभाल नहीं पा रही थी। लेकिन सबसे ज्यादा टूटे हुए थे- श्यामलाल जी।
खुशी उनके पास आई, और उनके गले लगकर फूट-फूटकर रो पड़ी- ‘‘पापा…. मैं नहीं जाना चाहती…’’
श्यामलाल जी ने उसे कसकर पकड़ा और कहा- ‘‘बेटी ये तो संसार का नियम है, हर बेटी को एक दिन ससुराल जाना पड़ता है बेटा… लेकिन याद रखना, यह घर हमेशा तेरा ही रहेगा।’’
खुशी ने रोते हुए पूछा- ‘‘अगर मुझे कभी दुख हुआ तो…?’’
श्यामलाल जी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा- ‘‘तो बिना सोचे वापस आ जाना… क्योंकि यह घर सिर्फ तेरा है, और हम हमेशा तेरे साथ हैं।’’
ससुराल की सच्चाई
शुरुआत में सब कुछ ठीक था। लेकिन धीरे-धीरे खुशी को एहसास हुआ कि उसकी ससुराल में उसे उतना प्यार और सम्मान नहीं मिल रहा, जितना उसने सोचा था।
छोटी-छोटी बातों पर ताने, काम का बोझ, और भावनाओं की अनदेखी… ऊपर से पहाड़ ही टूट पड़ा जब उसे पता चला कि उसका पति निकम्मा और नशेड़ी है।
वह अंदर ही अंदर टूटने लगी।
एक दिन उसने अपने पिता को फोन किया, लेकिन कुछ कह नहीं पाई। बस बोली- ‘‘पापा, आप कैसे हैं?’’
श्यामलाल जी उसकी आवाज़ सुनकर समझ गए कि कुछ ठीक नहीं है।
उन्होंने शांत स्वर में कहा- ‘‘बेटा, जब भी दिल भारी हो… घर आ जाना।’’
एक बड़ा फैसला
कुछ दिनों बाद खुशी अचानक अपने मायके आ गई। उसकी हालत देखकर श्यामलाल जी का दिल टूट गया। उन्होंने बिना कोई सवाल किए उसे गले लगा लिया।
‘‘अब कुछ मत कहना… बस आराम कर….।’’
समाज क्या कहेगा, लोग क्या सोचेंगे- इन सब बातों को उन्होंने एक तरफ रख दिया।
उन्होंने दृढ़ आवाज़ में कहा- ‘‘बेटी की खुशी से बड़ा कोई समाज नहीं होता।’’
कुछ महीनों बाद, खुशी ने खुद को संभाला। उसने पढ़ाई पूरी की, नौकरी शुरू की, और अगले कुछ ही दिनों में आत्मनिर्भर बन कर माता पिता के साथ खुशी से रहने लग गई। श्यामलाल जी हर दिन उसे देखकर गर्व महसूस करते थे।
एक दिन खुशी ने कहा- ‘‘पापा, आपने उस दिन मेरा साथ देकर मेरी ज़िंदगी बचा ली… नहीं तो पता नहीं मेरा क्या होता। काश दुनिया के हर माता-पिता की सोच आपके जैसी होती तो कोई बेटी ससुराल में प्रताड़ित होकर आत्महत्या जैसा गलत कदम नहीं उठाती।’’
श्यामलाल जी मुस्कुराए और बोले- ‘‘बेटी, शादी ज़िंदगी का हिस्सा है पूरी ज़िंदगी नहीं और याद रखना, बेटी बोझ नहीं होती। वह तो माता-पिता की सबसे बड़ी खुशी होती है। अपने जीते जी हम भला कैसे तुझे अकेला छोड़ सकते थे।’’
संदेश
बेटी की शादी सिर्फ एक रस्म नहीं, एक जिम्मेदारी है जिसे निभाते हुए माता-पिता अपने जिगर के टुकड़े को खुद से दूर एक नए घर में भेजते हैं। लेकिन माता-पिता का कर्तव्य सिर्फ शादी करवाना नहीं, बल्कि बेटी की खुशियों का ख़्याल रखना भी है। अगर बेटी ससुराल में दुखी है, तो उसे ‘‘समाज’’ के नाम पर चुप रहकर सब झेलने को मजबूर करना गलत है।
हर बेटी को यह हक है कि वह पूरी जिन्दगी सम्मान और स्वाभिमान के साथ खुशी-खुशी जी सके।

मुकेश कुमार सोनकर
रायपुर (छत्तीसगढ़)