आचार्य रामविलास शर्मा: मार्क्सवादी आलोचक के रूप में मूल्यांकन
हिंदी आलोचना के इतिहास में डॉ. रामविलास शर्मा एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने मार्क्सवादी चिंतन को भारतीय मिट्टी, संस्कृति और साहित्य की परंपरा से जोड़कर एक नया धरातल प्रदान किया। उन्हें प्रगतिशील लेखक संघ और हिंदी मार्क्सवादी आलोचना का मुख्य स्तंभ माना जाता है। उन्होंने मार्क्सवादी सिद्धांतों का किसी यांत्रिक या रूढ़िवादी तरीके से उपयोग करने का हमेशा विरोध किया और भारतीय साहित्य की अपनी मौलिक पहचान तथा ‘जातीय’ चेतना को रेखांकित किया। रामविलास जी कट्टर पश्चिमी मार्क्सवादी नहीं थे, जो यूरोपीय सिद्धांतों को सीधे हिंदी साहित्य पर थोप देते। उन्होंने कार्ल मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को जरूर अपनाया, लेकिन उनका दृढ़ विश्वास था कि भारत की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ और सांस्कृतिक विरासत यूरोप से बिल्कुल भिन्न हैं। उनका मानना था कि साहित्य की परख केवल आर्थिक आधार पर नहीं हो सकती, बल्कि उसमें मनुष्य की चेतना, युगीन परंपरा और जातीय संस्कृति का भी गहरा योगदान होता है। उन्होंने मार्क्सवाद को एक जीवंत पद्धति के रूप में देखा और दिखाया कि कैसे साहित्य समाज के आर्थिक और राजनैतिक संघर्षों को प्रतिबिंबित करने के साथ-साथ समाज को बदलने की क्रांतिकारी ताकत भी रखता है।
रामविलास जी की आलोचना का सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट पहलू उनकी श्जातीय चेतनाश् और सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन की अवधारणा है। जिस समय कुछ शुरुआती मार्क्सवादी आलोचक भारत के अतीत और संपूर्ण मध्यकालीन धार्मिक साहित्य को ‘सामंती’ कहकर पूरी तरह खारिज कर रहे थे, उस समय रामविलास जी ने डटकर इसका विरोध किया। उन्होंने भक्ति आंदोलन का गहन मूल्यांकन करते हुए कबीर और तुलसीदास को सामंतवाद-विरोधी तथा लोक-जागरण का महान कवि सिद्ध किया। उन्होंने स्थापित किया कि तुलसीदास की ‘रामायण’ भारतीय जनता के जातीय संघर्ष, आपसी जुड़ाव और सांस्कृतिक अस्मिता का अमर प्रतीक है। इसी तरह उन्होंने भारतेन्दु हरिश्चंद्र और प्रेमचंद के साहित्य का मार्क्सवादी विश्लेषण करते हुए यह दिखाया कि कैसे उनका लेखन ब्रिटिश साम्राज्यवाद और देश के भीतर व्याप्त सामंतवाद के खिलाफ एक सशक्त जन-आंदोलन था।
रामविलास शर्मा के आलोचना-कर्म का शिखर उनकी कालजयी कृति ‘निराला की साहित्य साधना’ में दिखाई देता है। महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को हिंदी जगत में सही अर्थों में स्थापित करने और उनकी प्रगतिशील चेतना को उभारने का श्रेय रामविलास जी को ही जाता है। उन्होंने मार्क्सवादी दृष्टि से यह सिद्ध किया कि निराला का काव्य केवल छायावादी कल्पना का लोक नहीं है, बल्कि उसमें शोषित वर्ग के प्रति गहरी सहानुभूति और पूंजीवाद के खिलाफ तीव्र आक्रोश व्याप्त है। ऐतिहासिक भौतिकवाद को आधार बनाकर उन्होंने साहित्य को उसके समय के आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक संदर्भों में रखकर देखने की परिपाटी विकसित की। उनके पूरे लेखन के केंद्र में औपनिवेशिक दासता और जमींदारी व्यवस्था के खिलाफ तीखा विरोध झलकता है, और वे क्लिष्ट तत्सम प्रधान भाषा के बजाय आम जनता की लोक-भाषा और लोक-तत्वों के प्रबल समर्थक रहे।
एक महान और युगांतरकारी आलोचक होने के बावजूद, रामविलास शर्मा के मूल्यांकन में कुछ ऐसी सीमाएँ और अंतर्विरोध भी थे, जिन्हें लेकर समकालीन आलोचकों ने उन पर सवाल उठाए। उनकी आलोचना दृष्टि में कई बार एक विशेष प्रकार का अति-आग्रह या आक्रामकता दिखाई देती थी, जिसके कारण वे अपने पसंदीदा कवियों की कमियों को नजरअंदाज़ कर देते थे, जबकि जिन लेखकों से उनका वैचारिक मतभेद था, उनके प्रति वे बेहद कठोर हो जाते थे। उन पर यह आरोप भी लगा कि वे नई कविता, अज्ञेय के ‘तार सप्तक’ और आधुनिकतावादी प्रवृत्तियों को समझने में थोड़े अनुदार रहे तथा नए प्रयोगों को अक्सर ‘पूंजीवादी भटकाव’ मान लेते थे। जीवन के उत्तरार्ध में भाषा विज्ञान पर किए गए उनके कार्यों में भी वैज्ञानिकता से अधिक भावुकता का पुट दिखाई देने लगा था।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद हिंदी आलोचना को सबसे अधिक विस्तार, वैज्ञानिकता और वैचारिक दृढ़ता देने वाले आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा हैं। वे मूलतः मार्क्सवादी (प्रगतिवादी) विचारधारा के रचनाकार थे, लेकिन उनका मार्क्सवाद किताबी या यांत्रिक नहीं था। उन्होंने विदेशी सिद्धांतों को हूबहू भारतीय साहित्य पर थोपने के बजाय, उसे भारतीय समाज की ऐतिहासिक परिस्थितियों, जातीय परंपरा और जन-संस्कृति के अनुकूल ढाला। डॅ. शर्मा की आलोचना दृष्टि केवल कमियाँ या खूबियाँ ढूँढने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह साहित्य के माध्यम से समाज के आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक नवजागरण को रेखांकित करने का एक जरिया थी। उनकी आलोचना पद्धति, कथ्यगत व शैलीगत विशेषताओं तथा भाषा संबंधी परिकल्पना को गहराई से समझे बिना आधुनिक हिंदी आलोचना के विकास को नहीं समझा जा सकता।
डॉ. रामविलास शर्मा की आलोचना पद्धति मूलतः द्वंद्वात्मक भौतिकवादी (Dialectical Materialistic) और ऐतिहासिक थी। इसका अर्थ यह है कि वे किसी भी साहित्यिक कृति या रचनाकार का मूल्यांकन हवा में नहीं करते थे, बल्कि उसे उसके युग की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के बीच रखकर परखते थे। उनकी पद्धति की सबसे बड़ी मौलिकता थी-परंपरा का सकारात्मक निषेध और उसकी खोज। जहाँ शुरुआती मार्क्सवादी आलोचक अतीत के साहित्य को श्सामंतीश् कहकर खारिज कर रहे थे, वहीं डॉ. शर्मा ने आगे बढ़कर तुलसीदास, कबीर और भारतेंदु जैसे कवियों का पुनर्मूल्यांकन किया। उन्होंने सिद्ध किया कि भक्ति-काव्य और भारतेंदु युग का नवजागरण अपने मूल चरित्र में सामंत-विरोधी और लोकधर्मी था। डॉ. शर्मा की आलोचना पद्धति ‘प्रतिमान-केंद्रित’ न होकर ‘रचना-केंद्रित’ थी; उनका मानना था कि कोई भी श्रेष्ठ कृति अपने मूल्यांकन के प्रतिमान स्वयं गढ़ती है, आलोचक का काम उन प्रतिमानों को खोजना है।
कथ्य के स्तर पर डॉ. शर्मा का पूरा जोर साहित्य की सामाजिक सरोकारिता और जनपक्षधरता पर था। उनके आलोचनात्मक निबंधों का मुख्य कथ्य यह परखना था कि साहित्य शोषित और मजदूर वर्ग की मुक्ति में क्या भूमिका निभा रहा है। उन्होंने ‘निराला की साहित्य साधना’ और ‘प्रेमचंद और उनका युग’ जैसी कालजयी कृतियों में शिल्प या रूप (Form) से अधिक महत्व अंतर्वस्तु या कथ्य (Content) को दिया, हालांकि वे रूप की उपेक्षा के विरोधी थे। शैली के स्तर पर डॉ. शर्मा बेहद प्रखर, आक्रामक और अकाट्य तर्कों से युक्त माने जाते हैं। उनकी शैली में ‘‘खंडन-मंडन और निर्णयात्मकता’’ का तत्व बहुत मजबूत था। वे जब किसी विचार का खंडन करते थे, तो ऐतिहासिक तथ्यों और उदाहरणों की ऐसी झड़ी लगा देते थे कि सामने वाले के तर्क धराशायी हो जाते थे। साथ ही, उनकी शैली में एक अंतर्निहित व्यंग्य और प्रखर कटाक्ष होता था, जो पूंजीवादी मानसिकता और सामंती रूढ़ियों पर सीधा प्रहार करता था।
डॉ. रामविलास शर्मा की भाषा संबंधी परिकल्पना हिंदी आलोचना जगत में क्रांतिकारी मानी जाती है। उन्होंने ‘‘‘हिंदी जाति’ (Hindi Nationality)’’ की एक अनूठी अवधारणा दी। उनका मानना था कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं है, बल्कि वह मानव समाज के गठन और उसके ऐतिहासिक विकास की उपज है। उन्होंने यूरोप के उन भाषावैज्ञानिकों की थ्योरी को खारिज किया जो नस्ल के आधार पर भाषा परिवारों की व्याख्या करते थे। डॉ. शर्मा के अनुसार, हिंदी प्रदेश की अपनी एक समृद्ध और एकीकृत जातीय संस्कृति है, जिसकी आत्मा यहाँ की लोक-भाषाओं (अवधी, ब्रज, भोजपुरी आदि) और खड़ी बोली के अंतर्संबंधों में बसती है। वे हिंदी को जनभाषा के रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते थे और भाषा में तत्सम शब्दों के अत्यधिक बोझ के खिलाफ थे। वे ऐसी सरल, जीवंत और व्यावहारिक हिंदी के पक्षधर थे, जो सीधे देश के किसानों और मजदूरों से जुड़ सके।
डॉ. रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि ने हिंदी साहित्य को एक स्वतंत्र और स्वाभिमानी पहचान दी। उनकी ऐतिहासिक आलोचना पद्धति ने अतीत की परंपरा को गौरवशाली बनाया, उनकी आक्रामक व तर्कसंगत शैली ने रूढ़ियों को तोड़ा और उनकी भाषा संबंधी जातीय परिकल्पना ने हिंदी को एक व्यापक सांस्कृतिक धरातल प्रदान किया। मार्क्सवादी विश्व-दृष्टि को भारतीय लोक-चेतना से जोड़कर उन्होंने आलोचना का जो समाजशास्त्र निर्मित किया, वह आज भी हिंदी आलोचना के लिए एक प्रकाश-स्तंभ की तरह कार्य कर रहा है।
निष्कर्षतः- डॉ. रामविलास शर्मा केवल बंद कमरों में बैठकर सिद्धांत गढ़ने वाले आलोचक नहीं थे, बल्कि उनका साहित्य सीधे जनता के संघर्षों और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा हुआ था। उन्होंने मार्क्सवाद को भारतीय चश्मा पहनाया और हिंदी आलोचना को एक स्वाभिमानी, जातीय और प्रगतिशील रूप प्रदान किया। तमाम वैचारिक मतभेदों और सीमाओं के बावजूद, यह अकाट्य सत्य है कि उन्होंने हिंदी साहित्य की परंपरा को हीनता ग्रंथि से बाहर निकाला। एक मार्क्सवादी आलोचक के रूप में उनका योगदान इतिहास में हमेशा अक्षुण्ण रहेगा, क्योंकि उन्होंने पूरे हिंदी समाज को यह अमूल्य सीख दी कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटे बिना भी प्रगतिशील और क्रांतिकारी कैसे बना जा सकता है।

अनुश्री पी
केरल